गुरुवार, 26 मार्च 2020

शिवलिंग को आप कितना जानते हैं ?

::::::::::: क्या है शिवलिंग::::::::::::
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 समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं |हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है |यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते |इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है |कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परम पवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पित अवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु...वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा  सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है |इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है।
दरअसल.इसमें ये गलतफहमी.. भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने  तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ  हो सकता है. |जैसा कि.... हम सभी जानते है कि. एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में. अलग-अलग अर्थ निकलते हैं....! उदाहरण के लिए.- यदि हम हिंदी के एक शब्द ""सूत्र''' को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि. नारदीय सूत्र ,.ब्रह्म सूत्र इत्यादि | उसी प्रकार ""अर्थ"" शब्द का भावार्थ: सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय  चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
ध्यान देने योग्य बात है कि""लिंग"" एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है :
@ त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५
अर्थात..... रूप, रस, गंध और स्पर्श ........ये लक्षण आकाश में नही है ..... किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है ।
@ निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ०
अर्थात..... जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है ....वह आकाश का लिंग है ....... अर्थात ये आकाश के गुण है ।
@ अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० ६
अर्थात..... जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये .... काल के लिंग है ।
@ इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ०
अर्थात....... जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है ....उसी को दिशा कहते है....... मतलब कि....ये सभी दिशा के लिंग है ।
@ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ० १ ०
अर्थात..... जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना आदि गुण हो, वो जीवात्मा है...... और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है ।
इसीलिए......... शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारन.......... इसे लिंग कहा गया है...।
स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है कि....... आकाश स्वयं लिंग है...... एवं , धरती उसका पीठ या आधार है .....और , ब्रह्माण्ड का हर चीज ....... अनन्त शून्य से पैदा होकर..... अंततः.... उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है .|यही  कारण है कि इसे कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)  इत्यादि |
यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ | इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है |ठीक इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं | क्योंकि ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है |इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति [काली] शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी ताल शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं |वैसे ही  पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है |
अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह ... शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बोला जाए तो. हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड की आकृति है.,उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है ,और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग ,भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है. | अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि...... इस संसार में न केवल पुरुष का  और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं |एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है |
हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है |परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं |जल-आकाश-वायु सर्वत्र |परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है |न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है |इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं |धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है |इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है |इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की |समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है |अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान |इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है |यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं |अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है |धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है |
अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है | लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है |इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है |......................................................................हर-हर महादेव 

रविवार, 15 मार्च 2020

वृक्षों को जल देने से सम्पन्नता आती है

पेड़ों को जल अर्पित करें और रहें सुखी संपन्न  
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भारतीय धार्मिक -सांस्कृतिक परंपरा में वृक्षों का बहुत महत्व है और इन्हें जल अर्पित करना बहुत लाभप्रद माना जाता है |इनको धर्म और संस्कृति से जोड़ने का कारण पूर्ण वैज्ञानिक है |इससे हमारे ज्ञानी महँ ऋषि -मुनियों की उच्चतर वैज्ञानिक ज्ञान और दृष्टि परिलक्षित होती है |इसका एक कारण तो वृक्षों का पर्यावरणीय दृष्टि से संरक्षण है ,दूसरा कारण हमारे लिए अधिक उपयोगी वृक्षों को बचाना और उनका संवर्धन है |इसके वैज्ञानिक कारण पर विचार करें तो अद्भुत बात समझ में आती है |जब आप किसी वृक्ष को जल लगातार एक निश्चित समय पर अर्पित करते हैं तो ,वृक्ष की चेतना और भावना आपसे जुडती है [ज्ञातव्य है की विज्ञानं भी वृक्षों को सजीव मानता है और यह भावनाओं की समझ रखते हैं साथ ही आपस में बात भी करते हैं ],वृक्ष आपकी भावना को समझ सकते हैं और आपकी आकांक्षा को एम्पलीफाई करके वातावरण में प्रक्षेपित कर देते हैं जिससे आपके लिए अनुकूल वातावरण बनाने में और आपकी ईच्छा पूर्ती में सहायता प्राप्त होती है |यह आपके आसपास सकारात्मक वातावरण का भी निर्माण करते हैं |अतः इन्हें जल चढ़ाना कई दृष्टियों से लाभप्रद होता है |
पीपल में जल अर्पित करने से सभी प्रकार के ग्रह दोष दूर हो जाते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा अन्य वृक्ष जैसे नीम, बरगद, बेलपत्र, अशोक, चंदन, आम आदि की भी पूजा की जाती है या इनके फल, पत्ते, तने को पूजा में शामिल किया जाता है।
पीपल में जल चढ़ाने से शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या में बहुत जल्द लाभ प्राप्त होता है, कालसर्प दोष का प्रभाव भी कम होता है। जिन लोगों का भाग्य साथ नहीं देता, उन्हें पीपल में प्रतिदिन जल चढ़ाकर, सात परिक्रमा करनी चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में व्यक्ति को भाग्य का साथ अवश्य मिलने लगेगा।
पेड़ों की पूजा या जल अर्पित करने से एक ओर तो हमारी कई समस्याएं दूर होती हैं, वहीं यह हरियाली के लिए भी फायदेमंद है। पेड़ों की रक्षा के लिए जल चढ़ाने की परंपरा बनाई गई है, ताकि धर्म के नाम पर लोग पेड़ों को जल अर्पित करें और उनकी रक्षा होती रहे। यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से हर रोज शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल अर्पित करता है तो उसे भी चमत्कारी परिणाम प्राप्त होते हैं। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पर जल चढ़ाना अक्षय पुण्य प्रदान करता है। जिन लोगों की कुंडली में कोई ग्रह दोष हो तो उनके लिए भी यह उपाय कारगर है। ग्रहों के दोष भी शिवलिंग पर जल चढ़ाने से दूर हो जाते हैं।
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला हो या किसी ग्रह की कुदृष्टि हो या बुरा प्रभाव देने वाले ग्रहों की युति हो या कोई अशुभ योग बन रहा हो तो ऐसी स्थितियों में पेड़ों से संबंधित कई उपाय हैं। इन्हें अपनाने पर कुछ ही समय में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगते हैं। राशि अनुसार इन पेड़ों को करें एक लोटा जल अर्पित और महसूस करें बदलाव ...
मेष एवं वृश्चिक:= खैर 
वृषभ एवं तुला:= गूलर 
मिथुन एवं कन्या:= अपामार्ग 
कर्क:= पलाश 
सिंह:= आक 
धनु एवं मीन:= पीपल 
मकर एवं कुंभ:= शमी 
इन्हीं पेड़ों की लकड़ियों से इन राशियों के स्वामी ग्रहों की शांति हेतु हवन किया जाता है।...................................................................हर-हर महादेव 

बच्चे को सुधारने का उपाय

बच्चा बिगड़ गया है ,आपकी बात नहीं मानता 
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आपका बच्चा गलत सगत में पड़ गया है ,आपकी बात नहीं मान रहा है ,उसका भविष्य बिगड़ रहा है ,पर उसे समझ नहीं है ,वह गलत रास्ते पर जा रहा है ,घर-खानदान-परिवार की ईज्जत की परवाह नहीं है ,तो निम्न प्रयोग से उसे सुधारा जा सकता है ,पर प्रयोग मज़बूरी में ही करें जब कोई अन्य विकल्प न दिखे ,क्योकि कोई भी क्रिया व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालती है और उसका बंधन करती है 
इस क्रिया को किसी भी शनिवार से शुरू करके लगातार सात शनिवार तक करें ,समय निश्चित रखें सायंकाल जब सूर्य डूब गया हो किन्तु अन्धेरा न हुआ हो अर्थात गोधूलि बेला में |एक कच्चा पापड ले ,उसपर थोड़े से काले उड़द ,एक गुड की डली ,दो लोहे की कीलें और थोड़ा सिन्दूर और काली मिर्च रखे ,इसके साथ एक लुटिया में जल लें और साथ में एक सरसों का दीपक ले ,सभी वस्तुओ को लेकर किसी पीपल के वृक्ष के पास जाएँ ,जल वृक्ष को अर्पित कर सभी वस्तुएं उसके नीचे रखे ,वस्तुएं पापड पर ही होनी चाहिए ,फिर दीपक जला कर प्रार्थना करें की आपके पुत्र को सद्बुद्धि आये और वह कुमार्ग से दूर हो सुधर जाए |फिर घर वापस आ जाए ,आते समय पलट कर वापस न देखें |घर आकर हाथ -पैर धो लें ,क्रिया को सबसे गुप्त रखें ,ईश्वर कृपा से बच्चा सुधर जाएगा |कभी -कभी विभिन्न नकारात्मक प्रभावों से अथवा लगातार गलत सगत से क्रिया करने के बाद भी फिर उसे गुमराह किया जाता है और उस पर उपयुक्त प्रभाव नहीं दीखता ऐसे में किसी अच्छे जानकार से किसी महाविद्या का कवच धारण कराया जाना चाहिए इस क्रिया के साथ ही ताकि बच्चे की सोच में आतंरिक परिवर्तन आये और उसकी नैतिकता ,अच्छे बुरे की समझ जाग्रत हो और वह खुद भी सुधरने का प्रयत्न करे |………………………………………………………………….हर-हर महादेव 

व्यापार-व्यवसाय वृद्धि कवच

व्यापार-व्यवसाय वृद्धि कवच 
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      कई बार अच्छा चलता व्यापार अचानक ही मंदा हो जाता है |एक ही व्यवसाय से सम्बंधित कई दुकाने आसपास होने पर भी किसी का व्यवसाय चलता है किसी का नहीं चलता |सामने बहुत बीद होती है पर उसके सामने कोई देखता तक नहीं या कम लोग आते हैं |इसका प्रभाव आर्थिक और मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है |क्रमशः आर्थिक मानसिक स्थिति खराब होने लगती है ,स्वास्थय साथ नहीं देता ,स्वभाव में कमियां आने लगती है ,अशांति-कलह-क्रोध-चिडचिडापन आने लगता है |जिस व्यापार में कभी लाभ ही लाभ था आज हानि होने लगती है या अत्यल्प लाभ रह जाता है |यद्यपि इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे ग्रह स्थितियों में बदलाव, किसी द्वारा किया गया अभिचार, पित्र दोष, कुल देवता दोष आदि आदि ,किन्तु मूल कारण नकारात्मक ऊर्जा जो इन सबमे से किसी द्वारा हो सकती है के द्वारा व्यक्ति और व्यापार का घिर जाना होता है |
      इन समस्याओं से निकलने के कई उपाय तंत्र में हैं ,किन्तु कुछ दुसाध्य है तो कुछ जानकारी और उपलब्धता के अभाव में कार्यरूप में परिणत नहीं हो पाते |इस हेतु सबसे अच्छा तरीका होता है की किसी अच्छे जानकार व्यक्ति की मदद ली जाए और व्यापार-व्यवसाय वृद्धि कवच बनवाकर धारण किया जाए |यह तरीका आसान होता है हालांकि कीमत जरुर अधिक हो सकती है ,जो सम्बंधित जानकार की क्षमता पर निर्भर करती है |यद्यपि आज के प्रचार और मशीनी युग में बाजार अथवा व्यक्तियों द्वारा बहुत प्रकार के यन्त्र -ताबीज दिए जा रहे है ,कितु प्रभाव कितना होता है यह धारक ही जानता है |
       इस समस्या हेतु यदि ताबीज में दीपावली में निर्मित महालक्ष्मी यन्त्र अथवा रविपुष्य योग में छुई-मुई -निर्गुन्डी-गुलमोहर के रस और सेई के कांटे के भस्म से निर्मित व्यापार वृद्धि यन्त्र ,दिव्य मुहूर्त रविपुष्य योग में निष्कासित और पूजित श्वेतार्कमूल  ,नागदौनमूल  ,हरसिंगारमूल  ,सांप के दांत ,हाथी दांत ,गोरोचन आदि विशिष्ट पदार्थ और वनस्पतियों का संयोग करके ताबीज बनाकर धारण किया जाये तो आशानुरूप परिणाम प्राप्त होते हैं |यद्यपि यह बहुत श्रम साध्य और योग्यतापूर्ण कार्य है ,जिसे विषय का अच्छा जानकार और साधक ही कर सकता है |
       ये सभी वस्तुएं -वनस्पतियाँ-यन्त्र मिलकर ऐसा प्रभाव उत्पन्न करते हैं की व्यक्ति पर से और उसके आसपास से नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव हट जाता है |शारीरिक ऊर्जा चक्रों की सक्रियता बढती है |उर्जा-उत्साह-उलास जागता है |विभिन्न नकारात्मक और अभिचार कर्म का प्रभाव रुकता है और जितना भाग्य में लिखा है वह पूरा मिल पाता है |साथ ही ग्रह दोषों, वास्तु दोषों का भी शमन होता है |धीरे धीरे व्यापार-व्यवसाय उन्नति की और अग्रसर होने लगता है |चूंकि इस प्रकार के कवच तांत्रिक और तीब्र प्रभावी होते हैं अतः शुद्धता और सावधानी भी आवश्यक होती है | ................................................................हर-हर महादेव 

व्यवसाय बंधन से बचाव के उपाय

व्यवसाय कार्य बंधन और तांत्रिक वस्तुएं 
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     आमतौर पर देखा गया है की एक ही प्रकार के दो प्रतिष्ठान ,दूकान पास-पास होते हुए भी एक का व्यवसाय अच्छा चल रहा है ,जबकि दुसरे का व्यापार ठप पड़ा रहता है अथवा बहुत कम चलता है |कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है की कभी किसी दूकान पर बहुत भीड़ लगती थी पर आज वहां एक भी ग्राहक दिखाई नहीं देता जबकि पास में बाद में खोली हुई दूकान बहुत अच्छी चल रही है ,,जिस घर में कभी सुख-शांति थी वहां एकाएक लड़ाई-झगडे , मार-पीट ,रोग-शोक पनप जाते हैं |क्यों ऐसा होता है |इसके यद्यपि कई कारण हो सकते हैं पर अक्सर इसके कारण तांत्रिक प्रयोग भी होते हैं ,छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए लोग खुद अथवा किसी लालची से तांत्रिक क्रियाएं करवाकर दुसरे को कष्ट दे देते हैं अथवा उसकी दूकान-प्रतिष्ठान बंधवा देते हैं ,कभी किसी जानकार से शत्रुता भी भरी पड़ जाती है ,वह कुछ क्रिया करके दूकान बाँध देता है |कभी-कभी इनमे जानकार की कोई गलती नहीं होती ,सामने वाला प्रतिद्वंदी किसी जानकार से जाकर कहता है की मेरे सामने वाला या पडोसी बहुत परेशां कर रहा है ,तांत्रिक क्रिया कर रहा है या समस्या उत्पन्न कर रहा है ,कोई उपाय करें ,अब जानकार अन्तर्यामी तो होता नहीं ,वह कुछ टोटके कर देता है या बता देता है ,परेशांन दूसरा व्यक्ति हो जाता है जबकि उसने कोई गलती नहीं की होती |ऐसा होता है अक्सर |
          यदि ऐसा हो और लगे की अचानक बहुत समस्या आ गयी है और दूकान-प्रतिष्ठान का व्यवसाय कम हो गया है ,अथवा आसपास अच्छी स्थिति होने पर भी आपके पास उपयुक्त व्यवसाय नहीं हो पा रहा हो तो बेहतर तो है की किसी अच्छे जानकार से संपर्क करें |यदि यह संभव न हो तो इसका एक सरल सा उपाय करें ,आपकी समस्या हल हो जाएगी |इसके लिए तीन तांत्रिक वस्तुएं लें सियार सिंगी ,बिल्ली की नाल और हत्था जोड़ी |यद्यपि इसके लिए बहुत सावधानी और परिश्रम की जरुरत होगी क्योकि बिल्ली की नाल और सियारर्सिंगी का  मिलना ही बेहद मुश्किल होता है |इन तीनो तांत्रिक वस्तुओं को प्राप्त कर प्राण-प्रतिष्ठित करवाकर एक डिब्बी में सिन्दूर भरकर अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान के कैश बाक्स या तिजोरी में रख दें |यदि घर पर रखना चाहें तो पूजा स्थान पर रख दें |तांत्रिक दोष निवारण के लिए इन तीनो वस्तुओं का घर अथवा प्रतिष्ठान में रखना ही पर्याप्त है ,इनका रोज धुप-अगरबत्ती -पूजा किया जाना ही पर्याप्त है |स्थापित होते ही इनका प्रभाव प्रारम्भ हो जाता है |कुछ ही दिनों में स्थिति सामान्य हो जाती है और व्यवसाय अपनी वास्तविक स्थिति में आ जाता है ,घर-परिवार में सुख-शांति आ जाती है |............................................................हर-हर महादेव 

तंत्र औषधियों से सिद्धियाँ मिलती हैं

तंत्र औषधि से सिद्धि भी समस्या निवारण भी
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तंत्र में औधधि प्रयोग को बहुत  महत्व दिया जाता है ,वनस्पतियो और पदार्थो ,जन्तुओ के उपयोग से शारीरिक क्षमता का विकास ,मानसिक केन्द्रीकरण किया जाता है और कठिन सिद्धिया भी कम समय में संभव हो पाती है ,कुछ तांत्रिक वस्तुओ के संयोग ऐसे प्रभाव उत्पन्न करते है की इच्छित चक्र उत्तेजित हो अधिक सक्रीय हो जाता है और सम्बंधित देवता की शक्ति जल्दी प्राप्त होने लगती है ,मूलाधार [काली ]साधना में इनका उपयोग आवश्यक हो जाता है,इनसे विभिन्न शारीरिक समस्याए स्वयमेव समाप्त हो जाती है  ,चित्र में दर्शित औषधि मूलाधार साधना और विभिन्न शारीरिक समस्याओं में लाभप्रद होती है ,जिसके निर्माण में आक की जड, चिरचिटा की जड़, बैंगन की जड़ ,सोंठ ,दालचीनी ,मुलहठी ,बच ,कपूर, मैनसिल, केसर, हल्दी, मुर्दा शंख ,बबूल गोंद, भांगपत्ती, आक की पत्तियों के रस समेत लगभग ३० तरह के दुर्लभ  पदार्थो -वनस्पतियों का उपयोग होता है ,यह संयोग ऐसा विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करता है की सर्वाधिक कठोर साधना सुगम होने लगती है ,,
   उपयोग विधि :: औषधि को मूलाधार पर सिक्के जैसी गोल आकृति में लगाया जाता है ,
   लाभ :::::लगाने और मंत्र जप से काली और मूलाधार की शक्तियों की सिद्धि ६ माह में ,,,केवल लगाने मात्र से स्त्रियों के योनी, रक्त विकार ,कमर दर्द ,त्वचा का रूखापन ,मानसिक तनाव-व्याधि ,स्नायु विकार ,कमर के नीचे की सक्रियता की कमी ,किसी कार्य की अरुचि , भूत- प्रेत, गर्भाशय विकार ,संतान हीनता ,,पुरुषो में उत्साह हीनता ,तनाव ,आलस्य ,क्रियाशीलता की कमी ,कामेक्षा की कमी ,कमर दर्द,शरीर के निचले हिस्से की कमजोरी  ,स्नायु विकार ,पौरुष की कमी ,दूर होते है ,,सक्रियता ,सबलता .साहस ,भय समाप्ति ,आतंरिक शक्ति की वृद्धि सबको प्राप्त होती है |
मूलाधार साधना में कामुकता का विशिष्ट महत्व है ,इसके लिए अंगो पर भी ध्यान दिया जाता है ,सभी अंगो की सबलता और सक्रियता हेतु विभिन्न प्रकार की औषधियों का प्रयोग होता है |शारीरिक क्षमता बढाने हेतु भी विभिन्न विशिष्ट औषधियों का सेवन किया जाता है |
     इसी प्रकार आज्ञा चक्र साधन अथवा गणपति साधना के लिए भी तंत्र में विभिन्न औषधियों का निर्माण किया जाता है ,जो असगंध, मैनसिल ,काकड़ासिंगी ,गोरोचन ,भृंगराज ,वंशलोचन ,बच, कूट ,भंग के बीज ,काक जंघा ,कपूर आदि विभिन्न प्रकार की दुर्लभ ३५ वस्तुओ से निर्मित होते है ,यह औषधीय यदि साधना में न भी प्रयोग की जाए और सामान्य उपयोग ही किये जाए तो भी अनेक समस्याए स्वतः समाप्त हो जाती है ,और सामान्य सिद्धि जैसे लाभ स्वतः प्राप्त होने लगते है .................................................................हर-हर महादेव 

वनस्पति और नक्षत्र विशेष में उनके चमत्कार

नक्षत्र और वनस्पति के संयोग से विविध कार्य सम्पादन
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[१] मृगशिरा नक्षत्र में महुवा वृक्ष की जड़ लाकर रखें तो चोरी नहीं होती है |
[२] स्वाति नक्षत्र में मोगरा की जड़ लेकर भैस के दूध में घिसकर पीने से काला रंग गोरा हो जाता है |
[३] मघा नक्षत्र में पीपल की जड़ लेकर पास में रखें तो रात्री में बुरे सपने नहीं आते हैं |
[४] उत्तराषाढा नक्षत्र में कलाग्रामा की जड़ लेकर हाथ में बांधे तो पहलवान से युद्ध में जीत सकता है |
[५]पुष्य नक्षत्र में नागरबेल की जड़ लेकर पास में रखने पर दुष्ट व्यक्ति से भय कम होता है |
[६]अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ को लाकर सर पर रखने से शत्रु मित्र हो जाते हैं |
[७]उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में नीम की जड़ को लाकर पास रखने पर लड़की होने की बजाय लड़का होता है |
[८]हस्त नक्षत्र रविवार के दिन अन्धाहुली को लेकर उच्च व्यक्ति के माथे पर डाले तो उच्च व्यक्ति वश में होता है और बुरा व्यक्ति भी प्यार करने लगता है |
[९]भरनी नक्षत्र में शंखाहुली की जड़ लाकर ताबीज में रखने पर स्त्री वश में होती है |
[१०] पुनर्वसु नक्षत्र में मेहंदी की जड़ को लेकर पास रखने पर अपने शरीर से अच्छी सुगंध आती है |
[११]विशाखा नक्षत्र में बबूल की जड़ को लाकर पास में रखने पर चरी प्रकाशित नहीं होता है |
[१२] हस्त नक्षत्र में चम्पा की जड़ लाकर गले में बांधने से भूत प्रेत नहीं लगता है |
[१३]मूल नक्षत्र में गूलर की जड़ लेकर पास रखने पर दूसरों का द्रव्य मिलता है |
[१४] शतभिषा नक्षत्र में केले की जड़ लेकर शहद के साथ पीने पर ताप नहीं होता है |
[१५]कृतिका नक्षत्र में रोहिस की जड़ लाकर पास में रखने पर अग्नि से भय कम होता है |
[१६]आश्लेषा नक्षत्र में धतूरा की जड़ लेकर घर की देहली में रखने पर सांप घर में नहीं आता है |
[१७] पुर्वाषाढा नक्षत्र में शहतूत की जड़ लेकर स्त्री को पिलाने पर योनी संकोच नहीं होती है |
[१८]पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में आम की जड़ लाकर दूध में घिसकर पिलाने से बाँझ स्त्री को पुत्र प्राप्त हो सकता है |
[१९]उत्तराषाढा नक्षत्र में पीपल की जड़ लेकर पास में रखने पर मनुष्य युद्ध में जीत जाता है |
[२०]रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि में नग्न होकर ,नगद बावची की जड़ लाकर पास में रखने पर वीर्य नहीं चलता है |
[२१]आर्द्रा नक्षत्र में अर्क की जड़ लाकर ताबीज में डालकर पास में रखने पर झूठी बात सच हो सकती है |
[२२]चित्रा नक्षत्र में गुलाब की जड़ लेकर पास में रखे तो शरीर में कष्ट नहीं होता है |
[२३]श्रवण नक्षत्र में आंवले की जड़ ,नागार्बेल के रस में पिए तो स्त्री नवयौवन प्राप्त करती है |
[२४]रेवती नक्षत्र में बड की जड़ लेकर माथे पर रखे तो दृष्टि चौगुनी होती है |.........................................................हर-हर महादेव 

महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...