रविवार, 25 मार्च 2018

आत्मा की अलौकिक शक्ति


आत्मा की अलौकिक शक्ति  
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हमारे शरीर में आत्मा वह केंद्र है जिसे शक्ति भी कहते हैं। उसके अप्रकट रहने का कारण है कि हमारा शरीर उसके केंद्र से संपर्क नहीं रखता जहाँ से सब कुछ सनातन काल से संचालित हो रहा है। वस्तुतः जीवन धारा के प्रतिकूल प्रवाह से उस केंद्र में निष्क्रियता बनी रहती है। जबकि आवश्यक है कि वह विशिष्ट शक्ति शरीर के सभी अंगो तक पहुँचे।  यदि वह एक अंग पर भी नहीं पहुँचती तो वह अंग बेकार हो जाता है। इसलिए मनुष्य द्वारा प्रयत्न यह किया जाना चाहिए कि उसके सभी अंग सुपुष्ट रह सकें। उसके अंदर सर्वशक्तिमान परमात्मा की समस्त शक्तियों का समग्रता व परिपूर्णता से संचार हो सके।
इसके लिए हमें उसके प्रकाश को पहचानना होगाजहाँ सत्य का अपने बुनियादी स्वरूप में निवास रहता है। उसी प्रकाश को जानने से हम परमात्मा को जान सकते हैं। उसको जाने बिना मोक्ष का द्वार कभी नहीं खुल सकता। उसे समझे बिना हम उस आनंद को नहीं समझ सकतेउस आनंद को वाणी के द्वारा अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। कोई भी शक्तिकोई भी ऊर्जा तभी लाभदायक सिद्ध होती है जब उसका सही ढंग से उपभोग किया जाए। किसी भी ऊर्जा के सही प्रयोग की आवश्यकता होती है। विद्युत को ही लीजिए उसका सही प्रयोग न हो तो वह प्राणांतक सिद्ध होती है। उसका प्रयोग निर्माण और नाश दोनों में ही किया जा सकता है। इसी प्रकार की ऊर्जा हमारे पास भी विद्यमान है। यदि हम उसका सदुपयोग करना चाहें तो सहज ही कर सकते हैं। 
हमारे शरीर के अंदर अवस्थित आत्मा अनेकानेक अलौकिक शक्तियों से युक्त है। फिर भी उनकी जानकारी न होने तथा प्रयोग का सही तरीका न जानने की वजह से अधिकांश लोग उसका लाभ उठाने से वंचित रह जाया करते है। किंतु साधन होते हुए भी उनका उपयोग न कर पाना अपनी ही कमी कही जाती है। जरा सोचिएजिसके पास नेत्र हैं और वे न देखें तो इसमें अपराध किसका कहा जाएगा?............................................................हर-हर महादेव 

महिलाओं की छठी इंद्री अधिक विकसित होती है


महिलाओं की छठी इंद्री अधिक विकसित होती है
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भारतीय परम्परा में महिलाओं को देवी कहा जाता है ,इसके अनेक कारण हैं |इसका एक कारण यह भी है की इनमे अतीन्द्रिय क्षमता पुरुष की अपेक्षा अधिक विकसित होती है |इसके विकास की संभावना अधिक होती है |कम प्रयास से अधिक सक्षम हो जाती है |इनमे प्रकृति की शक्ति अधिक आसानी से और शीघ्र स्थान ग्रहण करती है |इनमे सहानुभूतिभावुकता ,एकाग्रता ,सहनशीलता ,करुना आदि अधिक होती है ,जो इन्हें देवी स्वरुप प्रदान करता है |अब पाश्चात्य विज्ञान भी धीरे धीरे इसे प्रमाणित कर रहा है |
 ऐसा कहा जाता है कि महिलाओं में छठी इंद्रिय होतीहैलेकिन अब वैज्ञानिकों ने भी इस बात की पुष्टि करदी हैऑस्ट्रेलिया में हुए एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक महिलाएं किसी अपरिचित पुरुष का महज चेहरा भर देखकरबता सकती हैं कि वह विश्वास करने योग्य है या नहीं। खास बात यह है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में इस क्षमता का अभाव होता है। जर्नल बायोलॉजी लैटर्स में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक महिलाओं में पुरुषों को देखकर उनका आकलन कर लेने की क्षमता होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के एआरसी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के गिलीयन रोड्स के नेतृत्व में यह अध्ययन किया गया। अध्ययन के मुताबिक महिलाएं मानती हैं कि ज्यादा मर्दाना दिखने वाले पुरुष विश्र्वासपात्र नहीं होते हैं। महिलाओं के इस नजरिए में आकर्षण कोई भूमिका अदा नहीं करता है। अध्ययन के दौरान 34 महिलाओं और 34 पुरुषों को 189 वयस्कों के रंगीन फोटोग्राफ दिखाकर उनकी विश्वसनीयता का आकलन करने को कहा गया। अध्ययन में महिला प्रतिभागियों ने पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा सटीक जवाब दिए। वैज्ञानिकों के अनुसार विश्वसनीयता आपसी संबंधों के लिहाज से बेहद अहम है।.........................................................................हर-हर महादेव

कैसे जगाएं छठी इन्द्रिय को


:::::::::::::::::::कैसे जगाएं छठी इन्द्रिय को :::::::::::::::::::::
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छठी इंद्री को अंग्रेजी में सिक्स्थ सेंस कहते हैं। सिक्स्थ सेंस को जाग्रतकरने के लिए योग में अनेक उपाय बताए गए हैं। इसे परामनोविज्ञान काविषय भी माना जाता है। असल में यह संवेदी बोध का मामला है। गहरेध्यान प्रयोग से यह स्वतही जाग्रत हो जाती है।
 मस्तिष्क के भीतर कपाल के नीचे एक छिद्र हैउसे ब्रह्मरंध्र कहते हैं,वहीं से सुषुन्मा रीढ़ से होती हुई मूलाधार तक गई है। सुषुन्मा नाड़ी जुड़ी हैसहस्त्रार से। इड़ा नाड़ी शरीर के बायीं तरफ स्थित है तथा पिंगला नाड़ी दायीं तरफ अर्थात इड़ा नाड़ी में चंद्र स्वर और पिंगला नाड़ी में सूर्य स्वर स्थित रहता है। सुषुम्ना मध्य में स्थित हैअतः जब हमारे दोनों स्वर चलते हैं तो माना जाता है कि सुषम्ना नाड़ी सक्रिय है। इस सक्रियता से ही सिक्स्थ सेंस जाग्रत होता है। इड़ापिंगला और सुषुन्मा के अलावा पूरे शरीर में हजारों नाड़ियाँ होती हैं। उक्त सभी नाड़ियों का शुद्धि और सशक्तिकरण सिर्फ प्राणायाम और आसनों से ही होता है। शुद्धि और सशक्तिकरण के बाद ही उक्त नाड़ियों की शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है |
 यह छठी इंद्री सभी में सुप्तावस्था में होती है। भृकुटी के मध्य निरंतर और नियमित ध्यान करते रहने से आज्ञाचक्र जाग्रत होने लगता है जो हमारे सिक्स्थ सेंस को बढ़ाता है। योग में त्राटक और ध्यान की कई विधियाँ बताई गई हैं। उनमें से किसी भी एक को चुनकर आप इसका अभ्यास कर सकते हैं।
...... वैज्ञानिक कहते हैं कि दिमाग का सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही काम करता है। हम ऐसे पोषक तत्व ग्रहणनहीं करते जो मस्तिष्क को लाभ पहुँचा सकेंतब प्राणायाम ही एकमात्र उपाय बच जाता है। इसके लिए सर्वप्रथमजाग्रत करना चाहिए समस्त वायुकोषों को। फेफड़ों और हृदय के करोड़ों वायुकोषों तक श्वास द्वारा हवा नहीं पहुँच पानेके कारण वे निढाल से ही पड़े रहते हैं। उनका कोई उपयोग नहीं हो पाता। उक्त वायुकोषों तक प्राणायाम द्वारा प्राणवायु मिलने से कोशिकाओं की रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ जाती हैनए रक्त का निर्माण होता है और सभी नाड़ियाँ हरकत में आने लगती हैं। छोटे-छोटे नए टिश्यू बनने लगते हैं। उनकी वजह से चमड़ी और त्वचा में निखार और तरोताजापन आने लगता है।प्राणायाम से नादियों को शक्ति मिलती है जिससे छठी इंद्री के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित होने लगती हैं |
.....  भृकुटी पर ध्यान लगाकर निरंतर मध्य स्थित अँधेरे को देखते रहें और यह भी जानते रहें कि श्वास अंदर औरबाहर हो रही है। मौन ध्यान और साधना मन और शरीर को मजबूत तो करती ही हैमध्य स्थित जो अँधेरा है वही कालेसे नीला और नीले से सफेद में बदलता जाता है। सभी के साथ अलग-अलग परिस्थितियाँ निर्मित हो सकती हैं।मौन से मन की क्षमता का विकास होता जाता है जिससे काल्पनिक शक्ति और आभास करने की क्षमता बढ़ती है। इसी के माध्यम से पूर्वाभास और साथ ही इससे भविष्य के गर्भ में झाँकने की क्षमता भी बढ़ती है। यही सिक्स्थ सेंस के विकास की शुरुआत है। अंततहमारे पीछे कोई चल रहा है या दरवाजे पर कोई खड़ा हैइस बात का हमें आभास होता है। यही आभास होने की क्षमता हमारी छठी इंद्री के होने की सूचना है। जब यह आभास होने की क्षमता बढ़ती है तो पूर्वाभास में बदल जाती है। मन की स्थिरता और उसकी शक्ति ही छठी इंद्री के विकास में सहायक सिद्ध होती है|
त्राटक ,ध्यान केन्द्रीकरण आदि भी छठी इंद्री को जाग्रत करते हैं ,जिनके विषय में हम पहले लिख आये हैं |साकार बिंदु पर अथवा दीपक पर त्राटक से भी कुछ समय बाद अतीन्द्रिय शक्ति और छठी इंद्री विकसित होने लगती है |बाद के चरणों में यह छठी इंद्री को जाग्रत कर देती है |यह सभी साधन अथवा प्रयोग बहुत धैर्य और लगन शीलता माँगते हैं |छठी इंद्री जाग्रत होने पर लाभ की कल्पना नहीं की जा सकती |व्यक्ति में अतीन्द्रिय शक्तियों का उदय होने लगता है ,अब यह व्यक्ति पर निर्भर करता है की वह कहाँ तक क्या पा लेता है |
.............................................हर-हर महादेव 


छठी इन्द्रिय अर्थात अतीन्द्रिय ज्ञान से घटनाओं का पूर्वाभास


छठी इन्द्रिय अर्थात अतीन्द्रिय ज्ञान से घटनाओं का पूर्वाभास 
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क्या मनुष्य की छठी इंद्रिय होती हैकुछ लोग इसे हकीकत मानते हैं और कुछ कोरी कल्पना। अब वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि छठी इंद्रिय की बात सिर्फ कल्पना नहींवास्तविकता हैजो हमें किसी घटित होने वाली घटना का पूर्वाभास कराती है। 
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के रॉन रेसिक ने एक अध्ययन कर पाया कि छठी इंद्रिय के कारण ही हमें भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होता है। ऐसा माना जा रहा है कि अब लोगों की छठी इंद्रिय को और सक्रिय करने का प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि वाहनों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में कमी हो सके। रेसिक के अनुसार छठी इंद्रिय जैसी कोई भावना तो है और यह सिर्फ एक अहसास नहीं है। वास्तव में होशो-हवास में आया विचार या भावना हैजिसे हम देखने के साथ ही महसूस भी कर सकते हैं। और यह हमें घटित होने वाली बात से बचने के लिए प्रेरित करती है। करीब एक-तिहाई लोगों की छठी इंद्रिय काफी सक्रिय होती है। उन्हें घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। इसे सही तरीके से परिभाषित करना तो मुश्किल हैलेकिन इसके होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। 
अल सुबह नींद से जागने के लिए अलार्म घड़ियाँ तो हर कोई इस्तेमाल करता है। लेकिन बहुत कम लोग इस बात को जानते होंगे कि प्रकृति ने हमारे शरीर के भीतर भी एक अलार्म घड़ी की व्यवस्था कर रखी है। हाल ही में हुए वैज्ञानिक शोध से इस बात का पता चला है कि जब कभी हमें तड़के कहीं जाना होता है तो जागने के समय का अलार्म हमारे मस्तिष्क में स्वतः भर जाता है। हम भले ही सोते रहते हैंलेकिन निर्धारित समय से 1 घंटे पूर्व हमारे रक्त में एक विशेष हार्मोन का स्राव होने लगता है और जब वह चरम सीमा पर पहुँच जाता है तो हमारी नींद खुल जाती है। वैज्ञानिक इसे हार्मोन घड़ी कहते हैं। 
छठी इंद्री के जाग्रत होने से  व्यक्ति में भविष्य में झाँकने की क्षमता का विकास होता है। अतीत में जाकर घटना कीसच्चाई का पता लगाया जा सकता है। मीलों दूर बैठे व्यक्ति की बातें सुन सकते हैं। किसके मन में क्या विचार चल रहा हैइसका शब्दशपता लग जाता है। एक ही जगह बैठे हुए दुनिया की किसी भी जगह की जानकारी पल में ही हासिल की जासकती है। छठी इंद्री प्राप्त व्यक्ति से कुछ भी छिपा नहीं रह सकता और इसकी क्षमताओं के विकास की संभावनाएँ अनंतहैं।
आपने अगर स्टीवेन स्पिलबर्ग की चर्चित फिल्म मॉइनॉरिटी रिपोर्ट देखी हो तो आपको याद होगा कि कैसे उस फिल्म में एक विशेष सेल के सदस्य भविष्य में होने वाले अपराध को पता करके उसे घटित होने से पहले ही रोक देते थे। यह मजह एक फिल्मी कहानी नहीं है।
अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने वाले विद्वानों का मानना है कि यदि कोई तत्व प्रकाश की गति से भी तीव्र गति करे तो उसके लिए समय रुक जाता है। दूसरे शब्दों मेंवहां बीते कल,आज और आने वाले कल में कोई अंतर न रहेगा। अपने चित्त में यह गति साध ली जाए तो अतीत और भविष्य की घटनाएं चलचित्र की तरह देखी जा सकती हैं। अधिकतर दार्शनिकों का मत है कि घटनाओं के पूर्वाभास जीवन बचाने के लिए होते हैं और यह बात भी सच है कि यदि हम कमजोर मन इंसान से इस तरह के पूर्वाभासों का जिक्र करते हैतो वे किसी की मौत का कारण भी बन सकते हैं। अनेक बार पूर्वाभास स्पष्ट नहीं होते और न उनकी व्याख्या की जा सकती है।
प्रिमोनीशन एक्स्टां सॅन्सरी परसॅप्शन्स का वह रूप हैजिसे हम इन्स्टिंक्ट या भावी घटना का एक तीव्र आभास कह सकते हैं। ये एक तरह की 'इन्ट्यूटिव वॉर्निंग होती हैजो अवचेतन मन पर अंकित हो जाती है और कभी-कभी व्यक्ति को नियोजित कार्योँ को करने से मनोवैज्ञानिक तरह से रोकती हैं।
इसे बहुत से चिन्तक विशिष्ट घटनाओं की 'भविष्यवाणी भी कहते हैं। साइंस इसके स्टेट्स को अस्वीकार करता है। लेकिन दार्शनिकों का मानना है कि प्रिमोनीशन और प्रौफॅसी को व्यर्थ की चीज मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। क्योंकि घटनाओं के पूर्वाभास की जानकारी और उनका सही घटना प्रमाणित करता है कि'प्रिमोनीशन में तथ्य हैइसकी अर्थवत्ता है।इस तरह से यह साइंस के लिए एक चेतावनी हैक्योंकि यह सृष्टि की गतिविधियों के साथ मानव मन के सघन संबंध का संकेत देती है। यह आन्तरिक शक्तियों और सृष्टि में स्पन्दित अलौकिक शक्तियों व उसके चक्र के अन्तर्संबंध का विज्ञान है। कहा जाता है कि नॉस्टेंडम ने अपनी मृत्यु की 'पूर्व घोषणा कर दी थी।
जुलाई 1, 1566 जब एक पुरोहित उनसे मिलने आया और जाने लगा तो नॉस्टेंडम ने उससे अपने बारे में कहा कि 'वह कल सूर्योदय होने तक मर चुका होगा। इसी तरह अब्राहम लिंकन ने अपनी मौत का सपना देखा और अपनी पत्नी व अंगरक्षक को अपने कत्ल से कुछ घंटे पहले इस बारे में बताया। ...............................................हर-हर महादेव 


छठी इन्द्रिय [सिक्स्थ सेन्स ]


:::::::::::::::::::::::छठी इन्द्रिय [सिक्स्थ सेन्स ] :::::::::::::::::::::
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हम सभी की चाहत रहती है कि जीवन में आने वाली घटनाओं को जान सकें। इसके लिए ज्योतिषी एवं भविष्यवक्ता से संपर्क करते हैं। लेकिन विज्ञान कहता है कि हम सभी भविष्य और भूत की घटनाओं को दर्पण की तरह देख सकते हैं। मानव के अंदर एक ऐसा जीन छुपा रहता हैजिससे उसे भावी घटनाओं का पता चल सकता है। लेकिन व्यावहारिक रूप से वह पता नहीं कर पाता। अब वैज्ञानिकों ने यह रहस्य खोल लिया है। मानव अपने मस्तिष्क के जरिये भविष्य की घटनाओं का पता आसानी से लगा सकता है। आम तौर पर हमें आज और अभी या अपने आसपास की घटनाओं की ही जानकारी होती है। आने वाले या बीत गए समय की अथवा दूरदराज की घटनाओं का पता नहीं चलतालेकिन कोई विलक्षण शक्ति हैजो व्यक्ति को समय और दूरी की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए उपयोगी सूचनाएं देती हैजो भूतभविष्य अथवा वर्तमान में झाँकने की क्षमता रखती है। भविष्य में होने वाली घटना का पहले से संकेत मिलना ही पूर्वाभास है।यह छठी इंद्री या सेन्स का काम होता है | कुछ लोगों में यह अतीन्द्रिय ज्ञान काफी विकसित होता है तो कहा जाता है की उनका छठी इन्द्रिय या सिक्स्थ सेन्स विकसित है |पूर्ण जाग्रत अवस्था में यह तीसरा नेत्र है | छठी इन्द्रिय या सिक्स्थ सेन्स द्वारा अतीन्द्रिय ज्ञान होता है अर्थात वह ज्ञान जो सामान्य इन्द्रियों की समझ और पकड़ से परे हो |सामान्यतः हम पाँच ज्ञानेन्द्रियों के जरिए वस्तु या दृश्यों का विवेचन कर पाते हैंपरंतु कभी-कभी या किसी में बहुधा छठी इन्द्रिय जागृत हो जाती है। इस कपोल-कल्पित इन्द्रिय को विज्ञान ने अतीन्द्रिय ज्ञान (एक्स्ट्रा सेंसरी परसेप्शनका नाम देते हुए अपनी बिरादरी में शामिल कर लिया है।
इंद्रिय के द्वारा हमें बाहरी विषयों - रूपरसगंधस्पर्श एवं शब्द - का तथा आभ्यंतर विषयों - सु: दु: आदि-का ज्ञानप्राप्त होता है। इद्रियों के अभाव में हम विषयों का ज्ञान किसी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए तर्कभाषा के अनुसारइंद्रिय वह प्रमेय है जो शरीर से संयुक्तअतींद्रिय (इंद्रियों से ग्रहीत  होनेवालातथा ज्ञान का करण हो (शरीरसंयुक्तंज्ञानं करणमतींद्रियम्) बाह्य इंद्रियाँ क्रमशगंधरसरूप स्पर्श तथा शब्द की उपलब्धि मन के द्वारा होती हैं | सुख दु: आदि भीतरी विषय हैं। इनकी उपलब्धि मन के द्वारा होती है |मन हृदय के भीतर रहनेवाला तथा अणु परमाणु से युक्त माना जाता है | इंद्रियों की सत्ता का बोध प्रमाणअनुमान और अनुभव से होता है, प्रत्यक्ष से नहीं सांख्य के अनुसार इंद्रियाँ संख्या में एकादश मानी जाती हैं जिनमें ज्ञानेंद्रियाँ तथा कर्मेंद्रियाँ पाँच पाँच मानी जाती हैं | ज्ञानेंद्रियाँ पूर्वोक्त पाँच हैं |कर्मेंद्रियाँ मुखहाथपैरमलद्वार तथा जननेंद्रिय हैं जो क्रमशबोलनेग्रहण करनेचलनेमल त्यागने तथा संतानोत्पादन का कार्य करती है | संकल्पविकल्पात्मक मन ग्यारहवीं इंद्रिय माना जाता है |
पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने अतीन्द्रिय क्षमताओं को चार वर्गों में बाँटा है :
परोक्ष दर्शनअर्थात वस्तुओं और घटनाओं की वह जानकारी, जो ज्ञान प्राप्ति के बिना ही उपलब्ध हो जाती है।
भविष्य ज्ञानयानी बिना किसी मान्य आधार के भविष्य के गर्भ में झाँककर घटनाओं को घटित होने से पूर्व जान लेना।      
भूतकालिक ज्ञानबिना किसी साधन के अतीत की घटनाओं की जानकारी। 
टेलीपैथीअर्थात बिना किसी आधार या यंत्र के अपने विचारों को दूसरे के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इसके अलावा साइकोकाइनेसिस, सम्मोहन, साइकिक फोटोग्राफी आदि को भी परामनोविज्ञानियों ने अतीन्द्रिय शक्ति में शुमार किया है। 
विल्हेम वॉन लिवनीज नामक वैज्ञानिक का कहना है हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह कभी-कभार चमक उठने वाली इस क्षमता को विकसित कर पूर्वाभास को सामान्य बुद्धि की तरह अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेता है। इस तरह की क्षमता अर्जित कर सकता हैजब चाहे दर्पण की तरह अतीत या भविष्य को देख सके। हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह अपनी अन्तर्प्रज्ञा को जगाकर भविष्य काल को वर्तमान की तरह दर्पण में देख ले।
अतीन्द्रिय ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देते हुए केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक भौतिकी विद्वान एड्रियन डॉन्स ने फरमाया था, 'भविष्य में घटने वाली हलचलें वर्तमान में मानव मस्तिष्क में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैंजिन्हें साइट्रॉनिक वेवफ्रंट कहा जा सकता है। इन तरंगों की स्फुरणाओं को मानव मस्तिष्क के स्नायुकोष (न्यूरान्सपकड़ लेते हैं। इस प्रकार व्यक्ति भविष्य-कथन में सफल होता है। उनके मुताबिक मस्तिष्क की अल्फा तरंगों तथा साइट्रॉनिक तरंगों की आवृत्ति एक-सी होने के कारण सचेतन स्तर पर जागृत मस्तिष्क द्वारा ये तरंगें सहज ही ग्रहण की जा सकती हैं।
डरहम विश्वविद्यालय इंग्लैंड के गणितज्ञ एवं भौतिकीविद् डॉगेरहार्ट डीटरीख वांसरमैन का कथन है, 'मनुष्य को भविष्य का आभास इसलिए होता रहता है कि विभिन्न घटनाक्रम टाइमलेस (समय-सीमा से परेमेंटल पैटर्न (चिंतन क्षेत्रके निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्मांड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता हैचाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
एक्सप्लोरिंग साइकिक फिनॉमिना बियांड मैटरनामक अपनी चर्चित पुस्तक में डी स्कॉट रोगो लिखते हैं, 'विचारणाएँ तथा भावनाएँ प्राणशक्ति का उत्सर्जन (डिस्चार्ज ऑफ वाइटल फोर्सहैं। यही उत्सर्जन अंतःकरण में यदा-कदा स्फुरणा बनकर प्रकट होते हैं। जब यह दो व्यक्तियों के बीच होता है तो टेलीपैथी कहा जाता है और यदि यह समय-सीमा से परे सुदूर भविष्य की सूचना देता है तो पूर्वाभास | इसका आधारभूत कारण कॉस्मिक अवेयरनेस यानी ब्राह्मी चेतना होता है।इस चेतना का जिक्र आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत में मिलता है। उन्होंने लिखा है, 'यदि प्रकाश की गति से भी तीव्र गति वाला कोई तत्व हो तो वहाँ समय रुक जाएगा। दूसरे शब्दों मेंवहाँ बीते कलआज और आने वाले कल में कोई अंतर न रहेगा।'…

आपके भीतर ही छिपी है सारी क्षमताएं


आपके भीतर ही छिपी है सारी क्षमताएं
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वर्तमान युग वैज्ञानिक युग है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह मान लिया गया है कि मनुष्य के प्रत्येक व्यवहार के पीछे एक रसायन होता है। कहीं-कहीं न्यूरोट्रांसमीटर होता हैकहीं-कहीं केमिकल होता है और वह हमारे व्यवहार को नियंत्रित करता है। जब तक हम रासायनिक परिवर्तन की प्रक्रिया को नहीं समझ लेते हैंयौगिक रासायनिक परिवर्तन को प्रयोग में नहीं लाते हैं तो हमारे व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। जीवन में तीन बातें बहुत जरूरी होती है। जीवन जीने के लिए पहली बात है नियंत्रण की क्षमता। दूसरी बात हैज्ञान की क्षमता। ज्ञान में उसके सारे पक्ष जाते हैंसमझअवधारणा आदि-आदि। तीसरी बात हैआनंद की अनुभूति। ये तीन बातें अगर हमारे बौध्दिक विकास के साथ नहीं होती है तो जीवन खतरनाक बन सकता है।
नियंत्रण की क्षमता
बौध्दिक विकास बहुत आवश्यक हैइसे कभी कम मूल्य नहीं दिया जा सकताकिन्तु किसी भी वस्तु को सब कुछ मान लेने से एक भ्रांत धारणा बन जाती है। आज कुछ ऐसा ही हो गया है। चिंतन का एक विपर्याय-सा दृष्टिगत हो रहा है या एक बौध्दिक भ्रांति पैदा हो गई है। मनुष्य को अध्ययन के बाद परिवार मेंसमाज मेंसमुदाय में जीना है और उसमें बौध्दिक विकास जितना काम देता हैव्यवहार की अपेक्षा भी कम हो जाती है। हमारे जीवन से दो महत्वपूर्ण शब्द जुड़े हुए हैंदृष्टिकोण और व्यवहार। आदमी को व्यवहार से पहचाना जाता है। मानसिक संतोष और असंतोषमानसिक तनाव और मानसिक तनाव से मुक्तिये जितने बुध्दि से जुड़े हुए नहीं हैंउतने हमारे व्यवाहर से जुड़े हुए हैं।
एक स्वस्थशान्त और संतुलित जीवन जीने के लिए पहली शर्त हैनियंत्रण का क्षमता को विकसित करें। अपनी नियंत्रण क्षमता को बढ़ाएं। इसे कहीं बाहर से लाने की जरूरत नहीं है। हर व्यक्ति के पास नियंत्रण की क्षमता है। आज के मस्तिष्क-वैज्ञानिक इस बात को प्रतिपादित कर चुके हैं कि क्रोध की प्रणाली हमारे मस्तिष्क में हैतो क्रोध को नियंत्रण करने की प्रणाली भी हमारे मस्तिष्क मे ही हैं। दोनों प्रणालियां साथ-साथ काम कर रही हैं। इस बात को हम स्वयं कभी-कभी अनुभव करते हैं। जब क्रोध करते हैं तो भीतर में ही कहीं आवाज आती हैनहींअभी ठहरो। अभी इतना गुस्सा मत करोइतना क्रोध मत करो। यह आवाज भीतर में कहां से आती हैयह उस प्रणाली से आती है जो नियंत्रण प्रणाली हैजो साथ-साथ नियंत्रण करती चली जाती है। हमारी जितनी वृत्तियां हैंजितने आवेग हैंउनके साथ उन सबकी नियंत्रण की प्रणालियां भी काम कर रही हैं।
मस्तिष्क के कुछ विशिष्ट भाग हमारे व्यवहार के नियामक हैं। उन्हें सक्रिय किया जाए तो हमारी नियंत्रण क्षमता बढ़ सकती है। ललाट के मध्य का भागजिसे प्रेक्षाध्यान में ज्योति केन्द्र कहा जाता हैहमारे संवेग क्षेत्र का महत्वपूर्ण भाग है। मनोविज्ञान की भाषा में यह कषाय-जागरण का क्षेत्र है। लिंबिक सिस्टम और हाईपोथेलेमस का यह क्षेत्रजहां हमारी सारी भाव-धाराएं पैदा होती हैं और बढ़ती हैंअगर इस क्षेत्र पर हमारा नियंत्रण होता है तो हम संवेगों की दृष्टि सेआवेगों की दृष्टि से बहुत आश्वस्त हो सकते हैं। जो व्यक्ति इन पीनियल ग्लैंड के क्षेत्र पर ध्यान करता हैउसकी नियंत्रण की क्षमता बढ़ जाती है। पीनियल ग्लैंड बहुत सारी वृत्तियों पर नियंत्रण करता है।
आयुर्विज्ञान में पिच्यूटरी ग्लैंड को मास्टर ग्लैंड माना गया है। विज्ञान के क्षेत्र में पीनियल ग्लैंड पर अभी काम हो रहा है। हमारा यह स्पष्ट अनुभव है कि पीनियलपिच्यूटरी की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है। भारतीय योगविद्या में इस स्थान को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है। पिच्यूटरी की अपेक्षा भी पीनियल को अधिक महत्व दिया गया है। जितना नियंत्रण और जितनी शक्ति पीनियल के साथ है उतनी पिच्यूटरी के साथ नहीं है। अगर यह स्थान नियंत्रित होता है,तो वृत्तियों पर सहज नियंत्रण हो जाता है।
दस-बारह वर्ष के बच्चे में नियंत्रण की क्षमता ज्यादा होती है और सत्तर वर्ष के बूढ़े में नियंत्रण की शक्ति कम हो जाती है। बूढ़ा जितना चिड़चिड़ा होता हैबच्चा उतना चिड़चिड़ा नहीं होता। नाड़ी-तंत्र और ग्रंथि-तंत्र कमजोर होता है तो गुस्सा ज्यादा आने लगता हैव्यक्ति चिड़चिड़ा हो जाता है। वह नियंत्रण कम कर पाता है। इसका कारण बतलाया गयादस बारह वर्षों तक पीनियल ग्लैंड बहुत सक्रिय रहती है और वह सारे ‘हारमोन्स’ के स्रवण पर नियंत्रण भी रखती है। इसके बाद वह निष्क्रिय होना शुरू हो जाती है। उसकी निष्क्रियता कुछ समस्याएं पैदा करती हैं। यदि हम नियंत्रण की क्षमता को बढ़ा सकें तो हमारे जीवन का एक पक्ष बहुत अच्छा बन जाता है।
बौध्दिक विकास
जीवन का दूसरा पक्ष है ज्ञान। ज्ञान केवल बौध्दिक विकास पर ही आधारित नहीं है। हमारे मस्तिष्क में दो भाग हैं-दायां पटल और बांया पटल। बायां पटलजिसे उपनिषद् मे अपराविद्या कहा गयाभाषागणिततर्क आदि के लिए जिम्मेवार है और मस्तिष्क का दूसरा हिस्सा जिसे परविद्या कहा गयाअंतर्दृष्टिचरित्र आदि के लिए जिम्मेवार है। आज के शिक्षा संस्थानों में बायां भाग तो बहुत सक्रिय हो जाता हैकिन्तु दायां भाग सोया का सोया रह जाता है। इस असंतुलन ने अनेक समस्याएं पैदा कर दीं। आज सबकी शिकायत है कि हिंसा बहुत बढ़ रही है। अपराध बहुत बढ़ रहे हैं,आक्रमक वृत्ति बहुत बढ़ रही है। एक छोटा बच्चा भी आक्रामक हो रहा है। आक्रामकता सीधी झलक रही हैबढ़ रही है,हिन्दुस्तान में ही नहींपूरे विश्व में बढ़ रही है।
यह इसलिए हो रहा है कि दूसरे पक्ष की तरफ हमारा ध्यान नहीं है। नियंत्रण की तरफ हमारा ध्यान नहीं है। ज्ञान को जो दूसरा पक्ष हैअन्तर्दृष्टि को जगानाअपनी अतीन्द्रिय चेतना को जगानाउस ओर हमारी गति ही नहीं है। हमारे पास बहुत अतीन्द्रिय चेतना है। उसे जगाना आवश्यक है।
तीसरी बात हैआनंद। आज महाविद्यालयों के परिसर में मादक पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा बढ़ रही है। समाज में भी इसका प्रचलन बढ़ रहा है। यह प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही हैइसके पीछे एक आकर्षण है। बिना आकर्षण कोई भी चीज नहीं बढ़ सकती। मनुष्य का इसमें आकर्षण नहीं हैजितना सिगरेट पीने में आकर्षण है। आज सगरेट और शराब जैसी चीजें तो गौण हो गई हैंबहुत छोड़ी पड़ गई हैं। उसके स्थान पर बहुत से ‘ड्रग्स’ और हेरोइन जैसे पदार्थ गए हैं। सिगरेट उनके सामने कुछ भी नहीं है। यह नशे की प्रवृत्ति इतनी क्यों चल रही हैइसका कारण हैआनंद की खोज। आदमी आनन्द चाहता हैमस्ती चाहता है। मनुष्य अपने जीवन में मस्ती के क्षण चाहता है। वे उसे नहीं मिलते हैं तो वह नशा करता हैजिससे कुछ समय तक वह मस्ती में डूब जाता है। यह बहुत बड़ा आकर्षण हैजिसमें खिंचा वह नशे की चीजों का प्रयोग करता है।
विकल्प हमारे भीतर है
प्रश्न हैक्या इसका विकल्प नहीं हैविकल्प हमारे भीतर है। आनन्द का विशुध्द विकल्प हमारे भीतर है अगर हम भीतर के आनन्द को नहीं जगाएंगे तो नशे में जाना पड़ेगा। कोई उपाय नहीं है। इसे कभी रोका नहीं जा सकता। अगर भीतर के आनन्द को जगा लेंतो फिर नशे में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। अतीत और भविष्य से मुक्त होकर वर्तमान में जीना आनन्द के स्रोत को प्रकट करने का साधन है। भूत और भविष्यइन दोनों से हटकर आदि वर्तमान की धारा में चल सकें तो इतना आनन्द उद्भूत होगा कि फिर नशा करने की कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
आप बहुत तेज श्वास लो। सिगरेट का कश खींचते होवैसे ही जोर से श्वास लो और बहुत तेजी से श्वास निकालो जैसे धुएं का गुबार निकालते हो। कुछ समय बाद ही आनन्द की अनुभूति होने लगेगी और सिगरेट के प्रति वितृष्णा जाग जाएगा।
आनन्द का स्रोत
श्वास के साथ हमारी चेतना जुड़ जाती है तो हम वर्तमान में जीना सीख जाते हैं। आदमी वर्तमान में जीना सीख लेता है तो आनन्द का भीतरी स्रोत खुल जाता है। जब बाहर से आनन्द लेने की जरूरत बहुत कम हो जाती है तब सिगरेट की जरूरत होती है और नियम का अतिक्रमण कर मनोरंजन के साधनों को अपनाने की जरूरत होती है। अपेक्षाएं बहुत कम हो जाती हैं। हम इन मादक पदार्थों के सेवन की बात को कानूनी नियंत्रण या ऊपर के आश्वासन को थोपकर कभी नहीं मिटा सकतेजब तक हम भीतर के आनन्द को नहीं जगा लेते। भीतर का आनन्द जाग सकता हैवर्तमान में जीने के अभ्यास से। जिस व्यक्ति ने वर्तमान के क्षण को देखना शुरू कर दियावर्तमान की धारा के साथ अपने आपको प्रवाहित करना सुरू कर दियाउसे भीतर से इतना आनन्द आएगा कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
हमारी नियंत्रण की क्षमता के स्रोतहमारे अंतज्र्ञानकाअंतर्दृष्टि का स्रोत और हमारे आनन्द का स्रोत-ये तीन स्रोत हमारे भीतर हैं। इन पर आवरण या कूड़ा-करकट जमा हुआ है। अगर हम प्रयोग के द्वारा उस आवरण और कूड़े-करकट के ढेर को हटा सकें और उन स्रोतों को प्रकट कर सकेंतो एक नए जीवन का प्रारंभ हो सकता हैनए व्यापार का निर्माण हो सकता हैनई पीढ़ी का निर्माण संभव हो सकता है। उस पीढ़ी मेंउस व्यक्ति मेंजीवन की सारी सफलताओं का विकास ही नहीं होगासामाजिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय चरित्र का विकास भी होगा। वह व्यक्ति ऐसा बन जाएगा कि बाहर से गर्मी रही हैकिन्तु कोई प्रभाव नहींसर्वथा अप्रभावित अवस्था। हम प्रयोग द्वारा मस्तिष्क को बाह्य वातावरण से अप्रभावित बना सकते हैं।
वर्तमान वैज्ञानिक बताते हैंएक सामान्य व्यक्ति अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं का सात-आठ प्रतिशत भाग काम में लेता है। शेष सारी मस्तिष्क की क्षमताएं सोई रहती है। थोड़ा बड़ा आदमी होता है तो वह नौ-दस प्रतिशत काम में लेता हैज्यादा से ज्यादा दस-बारह प्रतिशत काम में ले लेता है। दस-बारह प्रतिशत मस्तिष्कीय क्षमताओं का प्रयोग करने वाला आदमी दुनिया का असाधारण व्यक्ति माना जाता है। हमारी अस्सी-नब्बे प्रतिशत क्षमताएं सोई की सोई पड़ी हैं। अगर हम उन्हें जगा सकें तो दुनिया का नक्शा बदल जाए। उन्हें जगाने का उपाय बाहर नहीं है। उन्हें जगाने के सारे उपाय हमारी भीतर हैं। यह बात जिस दिन समझ में आएगीहमारे व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास सहज संभव बन जाएगा।............................................................हर-हर महादेव 

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