रविवार, 2 फ़रवरी 2020

अपने कुलदेवता /देवी को कैसे जाने ?

कैसे जाने अपने कुलदेवता को [[कौन हैं आपके कुलदेवता /देवी ]]
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आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों से कुलदेवता/देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घर-परिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता/देवी कौन है |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |
 प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें और ११ मंगलवार तक करते रहें |मंगलवार को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता/देवी मानकर स्नान आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी भाषा में उनसे अनुरोध करें की "हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता/देवी में आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस-मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको स्वप्न में आपके कुलदेवता/देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी |............................................................................हर-हर महादेव

सिद्धि और सफलता -कैसे और कब ?

सिद्धि का मूल मंत्र 
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साधना तो हजारों हजार करते हैं पर सबको सफलता नहीं मिलती ,केवल कुछ को सफलता मिलती है उनमे भी कुछ को ही वास्तविक सिद्धि प्राप्त हो पाती है ,अन्य के कुछ काम हो जाते हैं और वह उसी आत्म संतुष्टि में खुद को सिद्धि का भी कभी कभी स्वामी मान लेता है |सिद्धि का अर्थ है सम्बंधित विषय से सम्बंधित शक्ति का साधक के नियंत्रण में आ जाना अथवा वशीभूत हो जाना ,यह बहुत कम होता है और इसकी अपनी एक तकनिकी है |इसका आडम्बर आदि से बहुत लेना देना नहीं होता |इसमें सबसे मुख्य भूमिका मष्तिष्क की होती है ,अन्य सभी माध्यम सम्बंधित ऊर्जा उत्पन्न करने अथवा बढाने का काम करते हैं |
किसी एक भाव में डूबिये ,उद्देश्य के अनुसार भाव बनाइये ,यदि वह किसी देवी-देवता का भाव है |अपने उद्देश्य के अनुसार देवी-देवता का चुनाव करें और खूब अच्छी तरह उसे समझें -जानें ,उसके कर्म-गुण-भाव के अनुसार अपना भाव बनाएं [उग्र शक्ति हेतु उग्र भाव और सौम्य शक्ति हेतु सौम्य भाव ],उसके प्रति अपने मन में भाव उत्पन्न करें की आप किस रूप में उस शक्ति का अपने लिए आह्वान कर रहे हैं |अब उस भाव में डूबकर विधिवत निश्चित समय ,दिशा ,सामग्री ,हवन समिधा आदि के द्वारा विधि पूर्वक प्रत्येक तकनिकी को अपनाकर उसी में लीं हो जाएँ |५ मिनट की स्मृति विहीनता प्राप्त हो जाए तो आप कोई भी देवता ,कोई भी मंत्र सरलता से सिद्ध कर सकते हैं |यह ठीक उसी प्रकार है ,जैसा बस के ड्राइवर को ट्रक ड्राइविंग का अभ्यास करना पड़े |यह केवल वाहन बदलना है और उसकी तीब्रता को नियंत्रित करने जैसा है |हां इसके लिए पहले तो आपको बस चलाना ,उसके पहले हलके वाहन और उसके पहले छोटा वाहन चलाना आना ही चाहिए ,|अचानक तो बस या ट्रक जान ले लेगा |अतः सर्व प्रथम तो एकाग्रता का अभ्यास ही होना चाहिए और छोटी-छोटी क्रियाएं ,तकनीकियाँ आनी चाहिए |
वाम मार्ग की तकनीकियों में संयम की कठोरता इतनी नहीं है |इसमें साधक के लिए ,साधना के समय संयम रखने के लिए केवल काली ,भैरव आदि की साधना में विशेष आवश्यकता पड़ती है |इसमें तकनिकी ,तंत्र -सामग्री ,शरीर के अंगों आदि का महत्व है ,जिन्हें अभ्यासित करना पड़ता है |इससे शक्ति उत्पन्न होती है |साधक को उस शक्ति को नियंत्रित करने भर का अभ्यास करना होता है |इस नियंत्रण के लिए ही तंत्र साधना की जाती है |जैसे काम भाव जाग्रत कीजिये पर स्खलन किये बिना समाधिस्थ हो जाइए |इसमें पहले रीढ़ की हड्डी से होकर ऊर्जा उपर खींचा जाता है |यह सब तकनीकियाँ हैं |इन्ही तकनीकियों के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ती है |कैसे क्या क्रिया करनी चाहिए ,यह जाने बिना सफलता नहीं मिल सकती |इसीलिए तंत्र साधना बिना गुरु के नहीं हो सकती |
सिद्धि की विधि कोई हो ,मार्ग कोई हो ,यदि सफलता चाहिए तो मानसिक शक्ति की तीब्रता ,दृढ़ता ,भाव को स्थिर किये रहने की क्षमता का विकास ही उद्देश्य होता है |जिसने इसे प्राप्त कर लिया उसके लिए सभी सिद्धियाँ आसान हैं |विधि और मार्ग के अनुसार केवल कुछ तकनीकियाँ बदलती हैं मूल सूत्र यथावत रहते हैं |मानसिक एकाग्रता और भाव के बिना कोई सिद्धि या साधना सफल नहीं हो सकती |तकनिकी और सामग्री ऊर्जा उत्पन्न या बढाते हैं और उसे नियंत्रित करने का तरीका बताते हैं पर मूल शक्ति का आकर्षण और नियंत्रण मानसिक बल से ही होता है | ...................................................................हर-हर महादेव

ईश्वर की शक्ति आपको महसूस हो सकती है

ईश्वरीय ऊर्जा तो दिनों में महसूस हो सकती है
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ईश्वरीय ऊर्जा का महसूस होना ,अर्थात उस ईश्वरीय ऊर्जा का आपके आसपास आना ,अर्थात उस ईश्वरीय ऊर्जा का आकर्षित होकर आपके आसपास संघनित होना कुछ ही दिनों में भी हो सकता है और सालों लग सकते हैं |यदि पूर्ण श्रद्धा है  तो इस श्रद्धा से भाव उत्पन्न होता है उससे उत्पन्न तरंगे उस शक्ति या ईश्वर को आकर्षित करती हैं ,उससे जुडती हैं ,उसे आंदोलित करती हैं ,उसे वशीभूत करती हैं |यदि आपको अपने आप पर पूर्ण विश्वास है ,उस ईश्वर में पूर्ण विश्वास है की वह है और वह आएगा तो एक अतीन्द्रिय मानसिक बल और शक्ति का उदय होता है ,और इस बल से उत्पन्न तरंगें उस ईश्वर या शक्ति तक पहुचने में और मार्ग के विघ्न हटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं |इन प्रक्रियाओं में अथवा उस शक्ति या ईश्वर तक पहुचने में कुछ समय लगता है अथवा उसे आकर्षित होकर उसकी ऊर्जा के आपके आसपास संघनित होने में समय लगता है ,एअसे में आपकी एकाग्रता महती भूमिका निभाती है ,यह टूटी नहीं की शक्ति रूक जाती है या बिखर भी सकती है |अतः एकाग्रता बनी रहनी चाहिए |यदि आप एकाग्र है तो शक्ति का आकर्षण भाव और मानसिक बल से होता है और वह आपसे धीरे-धीरे जुड़ने लगती है |पहले उसका संघनन आसपास और आपके शरीर में होता है ,वह आपके शरीर के अपने गुण के अनुसार सम्बंधित चक्र से जुड़ता है और वहां से तरंगों का उत्पादन बढ़ता है ,शक्ति के संघनन बढने के साथ और आपके सम्बंधित चक्र की गतिशीलता-क्रियाशीलता बढने के साथ ही उसकी ऊर्जा आपको महसूस होने लगती है यद्यपि उसका प्रत्यक्षीकरण बहुत बाद की बात होती है जबकि पूर्णता आ जाती है ,किन्तु महसूस पहले होने लगता है ,यह तो महसूस उसके जुड़ने के साथ ही होने लगता है की कुछ परिवर्तन हो रहा है |क्या और कितना हो रहा है यह बाद में ही समझ में आता है |[अलौकिक शक्तियां पेज के पाठकों के समक्ष व्यक्तिगत विचार ]|
यह सब कुछ दिनों में भी हो सकता है |यदि आपका मष्तिष्क एकाग्र है ,स्थिर है ,भटकाव नहीं है ,विचार शून्य हो एक ही भाव पर स्थिर है या एक ही शक्ति पर ,उसके ही गुण-आकृति-भाव में स्थिर है तो कुछ ही दिनों में वह आपको महसूस होने लगता है |यदि आप सम्बंधित शक्ति के बारे में ,उसकी साधना-पूजा तकनीकियों को अच्छे से जानते हैं ,यदि आपको सम्बंधित शक्ति पर पूर्ण विश्वास है ,अपने कर्म पर पूर्ण विश्वास है तो सफलता शीघ्र मिल सकती है |यदि आपको श्रद्धा है उस शक्ति में ,उसके भाव में आप लिप्त हैं तो वह भी आपसे जुड़कर अपनी उपस्थिति आपके साथ बहुत शीघ्र दर्शाता है ,क्योकि वह तो सब जगह है ,सभी शक्तियां या देवी देवता आपके किसी न किसी चक्र से सम्बंधित होते हैं |आपके यह भाव -विश्वास-श्रद्धा-एकाग्रता तो केवल उसे आपसे जोड़ने के माध्यम हैं |जब आप अपनी पूर्ण सक्रियता से उससे जुड़ते हैं तो वह भी आपसे जुड़ जाता है |यह सब दिनों में हो सकता है ,कभी भी हो सकता है |सिद्धि के लिए निश्चित संख्या ,निश्चित दिन म्संकल्प की जरुरत होती है ,ईश्वर तो इन सब से परे है |वह कभी भी कहीं भी आपसे जुड़ सकता है |बस जरुरत उसके भाव में एकाग्र हो उस भाव में डूब जाने की होती है |कुछ मिनटों की आत्मविस्मृति भी अगर किसी भाव -गुण-ईश्वर में मिल जाए तो वह शक्ति आपको अपने प्रभाव से परिचित कराने लगती है |सिद्धि तो उस शक्ति से कार्य कराने या अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए होती है जबकि वह पूर्ण वशीभूत हो आपके कार्य करता है |पर उसकी ऊर्जा तो बहुत पहले ही महसूस हो सकती है |[व्यक्तिगत विचार ] ............................................................................हर-हर महादेव

ईश्वर सदैव ही परीक्षा नहीं लेता है

क्या वास्तव में भगवान् हमेशा ही परीक्षा लेता है  ?
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जन सामान्य की प्रचलित भावना है की ईश्वर परीक्षा लेता है ,श्रद्धालु की |सामान्य कहावत है की जब आप ईश्वर की आराधना करते हैं तो वह आपकी परीक्षा लेता है ,कहा जाता है की ईश्वर आपको दुःख देकर आपकी सहनशीलता की परीक्षा लेता है ,आपकी श्रद्धा और भक्ति की परीक्षा लेता है |सामान्यतया ऐसा नहीं होता है क्योकि ईश्वर तो ऊर्जा स्वरुप है ,यह तो आप में ही हमेशा है |यह कहीं अन्य जगह से तो आता नहीं की आकर वह आपकी परीक्षा लेगा |हो सकता है यह किसी उच्च स्तर की स्थितियों में होता हो जब आप किसी उद्देश्य विशेष जिससे प्रकृति में परिवर्तन होता हो की स्थितियों में ईश्वरीय ऊर्जा द्वारा आपके आत्मबल और क्षमता की परीक्षा की स्थितियां हो ,पर सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता |यह भ्रामक है सामान्य जन के लिए |कष्टों से मुह मोड़ उन्हें सहने का एक तरीका है ईश्वर के नाम पर |कारण खोज उससे बचने के प्रयास से बचने का बहाना भी हो सकता है ,हालांकि सामान्यजन कारण समझ ही नहीं पाते |मेरी बात अनेक लोगों को अनुपयुक्त और गलत लग सकती है जो कहानी-कथा-रूढ़ी-मिथक को मानते हैं ,पर जो ईश्वर को ऊर्जा स्वरुप और सर्वत्र व्याप्त मानते होंगे वह कहीं न कहीं से सहमत होंगे |यह पोस्ट हम उन कारणों को जानने के प्रयास में लिख रहे की आखिर यह ईश्वर की परीक्षा क्यों लगती है ,क्या इसके कोई और कारण हो सकते हैं |
सुख-दुःख व्यक्ति के पूर्व संचित कर्म हैं जिसे भाग्य कहा जाता है ,इनमे तब तक परिवर्तन नहीं हो सकता जब तक की आप उस स्थिति में न पहुच जाए की इसे प्रभावित कर सके |इसे प्रभावित तभी किया जा सकता है जब आपमें ईश्वरीय ऊर्जा का अवतरण इतना हो जाए की आपके पूर्व कर्मों का क्षय हो जाए और आप परिवर्तन की क्षमता प्राप्त कर लें ,ऐसा होता है पर लाखों में एक साधक के साथ |सामान्य रूप से पूर्वकृत कर्मानुसार बने भाग्य को भुगतना ही पड़ता है |यह तो आपके पूर्व के कर्म है इसे ईश्वर की परीक्षा का नाम देना गलत है |यह ये साबित करते हैं की आपके आज के कर्म या सात्विकता या साधना इस स्तर पर नहीं पहुची है की आप भाग्य को प्रभावित कर सके ,अभी पूर्वकृत कर्मो और वर्त्तमान कर्मो का संतुलन पूर्वकर्मों के पक्ष में है अतः आपको वह भुगतना ही पड़ता है |
जब आप ईश्वर की साधना-आराधना-पूजा-अनुष्ठान करते हैं तो कष्ट बढ़ते हैं ,विषम स्थितियां बनती हैं ,जिसे आप कहते हैं की ईश्वर परीक्षा ले रहा है या लेता है ,सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता |इन कठिनाइयों का कारण आपके आसपास और आपके अन्दर की नकारात्मक ऊर्जा है |जब आप साधना-आराधना-पूजा-अनुष्ठान करते हैं तो आपके आसपास और आपमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है ,जिससे आपके आसपास और अन्दर उपस्थित नकारात्मक उर्जा को कष्ट और दिक्कत होती है ,जिससे वह प्रतिक्रिया करने लगता है और आपकी परेशानियाँ बढाने लगता है ,ऐसे में आपके कष्ट और दीक्कतें बढ़ जाती है ,काम बिगड़ने लगते हैं ,उथल-पुथल मच जाती है और आप कहने लगते हैं की ईश्वर परीक्षा लेता है या ले रहा है ,पर यह तो वास्तव में क्रिया की प्रतिक्रिया है ,ईश्वर खुद कुछ नहीं कर रहा ,उसके ऊर्जा की सकारात्मकता से नकारात्मक उर्जा को कष्ट हो रहा है और वह यह सब कर रहा है |ऐसे में इश्वर की परीक्षा की बात सही नहीं होती |
जब आप किसी शक्ति अथवा ईश्वर की साधना करते हैं तो आपमें सम्बंधित शक्ति या ईश्वर का अंश बढने लगता है ,आसपास उस ऊर्जा का संघनन होने लगता है ,कोई ऊर्जा बढती है तो किसी ऊर्जा को जाना पड़ता है ,संतुलन बदलता है ,अतः प्रकृति की सामान्य व्यवस्था में भी परिवर्तन होता है |जब प्रकृति की सामान्य व्यवस्था में परिवर्तन होता है तो यह भी प्रतिक्रिया करती है ,फलतः कुछ विक्षोभ उत्पन्न होते हैं और अप्रत्यासित घटनाएं होती हैं ,जिसे ईश्वर की परीक्षा का नाम दिया जाता है ,पर यह तो वह प्रतिक्रियाएं हैं जिन्हें हम वैज्ञानिक रूप से समझ नहीं पाते ,ईश्वर खुद सीधे हस्तक्षेप नहीं कर रहा कहीं पर ,उसके ऊर्जा के आने मात्र से यह सब प्रतिक्रिया स्वरुप होता है ,फिर वह परीक्षा कहाँ ले रहा है |
कभी-कभी जब हम किसी शक्ति की साधना करते हैं तो वह शक्ति भी प्रतिक्रिया करती है |कोई भी शक्ति कभी किसी के नियंत्रण में नहीं आना चाहती |यह शक्ति ईश्वर अथवा अन्य कोई शक्ति भी हो सकती है |जब आप उसे साधना से साधित करने की कोसिस करते हैं तो वह भी प्रतिक्रया करती करती है और आपकी प्रकृति और वातावरण को प्रभावित करती है ,जिससे अचानक सामान्य रूप से चल रही स्थितियों में परिवर्तन होते हैं और आप असहज हो सकते हैं या घटनाएं हो सकती हैं ,यह उर्जा की प्रकृति बदलने से होता है ,वह शक्ति अपनी तरह स्थितियों को बदलने का प्रयास करती है और आप अपने अनुसार रहने के आदी होते हैं फलतः घटनाएँ असामान्य लगती हैं और परीक्षा का नाम दिया जा सकता है |आने वाली शक्ति को जब आप नियंत्रित करने की कोसिस करते हैं तो तीब्र प्रतिक्रियाएं होती है क्योकि ऊर्जा संतुलन तत्काल प्रभावित होता है अन्दर भी बाहर भी और परिवर्तन तेजी से होते हैं जिससे नयी व्यवस्था बनाने में पुरानी व्यवस्था बदलती है और उथल-पुथल हो सकती है |यह सब उर्जाओं का खेल होता है |कभी कभी इसके सुखद और कभी दुखद भी परिणाम होते हैं ,क्योकि ऊर्जा न सँभलने पर परिपथ बिगड़ने का खतरा भी उत्पन्न होता है |ऊर्जा का तो आगमन होता है ,बाकी तो सब आप करते हैं ,सब आपकी क्षमता और कार्यों का खेल होता है ,नाम ईश्वर का दिया जाता है |
ईश्वर क्यों और कैसे परीक्षा ले सकता है |वह कोई मनुष्य तो है नहीं की वह आपको जांचेगा की आपमें वास्तव में श्रद्धा है की नहीं ,भक्ति है की नहीं ,कितनी सहनशीलता है ,कितने योग्य हैं ,आदि आदि |वह ईश्वर तो आपमें ही है ,सर्वत्र व्याप्त है ,वह तो पहले से ही सबकुछ जानता है ,वह तो सबकुछ देख रहा होता है ,वह तो आपके मन में ही है और आपके मन तक के विचार सुन रहा होता है ,आपके शरीर के हर अवयव में उसको देख रहा होता है ,अवचेतन में आपकी सारी स्थिति जनता है |आत्मा स्वरुप वह तो खुद आपके साथ है ,वह है तभी तो आप हैं या आत्मा है ,,आत्मा नहीं तो फिर तो आप भी नहीं होंगे ,ईश्वर भी तो परमात्मा [परम+आत्मा ] ही है ,बस वह मूल है और आप अंश ,पर है तो आपके साथ ही |फिर वह आपकी क्यों परीक्षा लेगा |वह परीक्षा नहीं लेता ,वह सर्वज्ञ है |जिसको परीक्षा कहते है हम सामान्य भाषा में वह हमारे कर्म होते हैं ,वह क्रिया की प्राकृतिक प्रतिक्रिया होती है ,वह नकारात्मक उर्जायें जो हमको घेरे रहती हैं उनकी प्रतिक्रियाएं होती हैं,वह प्रकृति की नैसर्गिक नकारात्मक शक्तियों की प्रतिक्रियाएं होती हैं ,वह उन शक्तियों की प्रतिक्रियाएं होती हैं जिन्हें हम नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं |ईश्वर तो बस आता है, उसकी ऊर्जा-शक्ति का आगमन और संधनन बढ़ता है आपमें और आपके आसपास |उसके आने मात्र से क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं होती हैं ,आपके अन्दर भी और बाहर भी |प्रतिक्रिया वह करते हैं जिनको परेशानी होती है और नाम ईश्वर का होता है की वह परीक्षा ले रहा है |
ईश्वर परीक्षा ले सकता है ,अगर कहा गया है तो बिलकुल गलत नहीं है |इसके पीछे लाजिक और कारण होते हैं |पर हमेशा हर स्थितियों में ईश्वर परीक्षा नहीं लेता रहता है |आपके कर्म होते हैं और प्रतिक्रियाएं होती है |ईश्वर बहुत उच्च स्तर पर ही परीक्षा लेता है |वह वहां परीक्षा लेता है जब आप एक निश्चित स्तर पर पहुच चुके होते हैं |जब आप इस स्थिति में पहुचते हैं की आप प्रकृति में हलचल मचाने लगते हैं ,आपकी शक्ति से प्रकृति प्रभावित होती हैं तब प्रकृति प्रतिक्रया व्यक्त करती है ,,जब आपकी यही शक्ति और उच्च स्तर पर होकर देव लोक को प्रभावित करने लगती है तब आपकी परीक्षा ली जाती है और आपको आपके पथ से च्युत करने के यत्न भी हो सकते हैं | |सामान्य रूप से तो नकारात्मक उर्जाओं की प्रतिक्रियाएं और भाग्य ही प्रभावित करते हैं और प्रतिक्रियाएं देते हैं |.[पूर्णतः व्यक्तिगत विचार ]..........................................................................हर-हर महादेव

क्या है नकारात्मक ऊर्जा [Negative Energy] ?

 नकारात्मक ऊर्जा 
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नकारात्मक ऊर्जा पृथ्वी के सतह के आसपास सृष्टि अथवा जीवन की उत्पत्ति पर क्रिया-प्रतिक्रया के फलस्वरूप उत्पन्न ऊर्जा का रूप है जो जीवन को प्रभावित करती है |जो ऊर्जा जीवन को लाभ दे ,उन्नति दे ,विकास और खुशहाली दे वह उस जीवन के परिप्रेक्ष्य में सकारात्मक ऊर्जा कही जाती है और जो इन सबमे बाधक हो और कष्ट दे वह नकारात्मक ऊर्जा कही जाती है| जो ऊर्जा पृथ्वी पर उपस्थित जीवन वनस्पति को कष्ट दे ,स्वास्थय प्रभावित करे ,अवरोध दे ,सुचारू जीवन में बाधा उत्पन्न करे, जीवन नष्ट करने का प्रयत्न करे वह नकारात्मक ऊर्जा है |नकारात्मक ऊर्जा कहीं बाहर से नहीं आती यह पृथ्वी की सतह पर उपस्थित होती है और प्रभावित करती रहती है |इस नकारात्मक ऊर्जा को हम कई श्रेणियों में बाँट सकते हैं |कुछ सदा सर्वदा उपस्थित रहती हैं और सदैव बनी रहती है तथा कुछ समय के अनुसार उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं |
सकारात्मक ऊर्जा का गहरा सम्बन्ध प्रकाश और धनात्मक ऊर्जा से होता है जबकि नकारात्मक ऊर्जा का सम्बन्ध अँधेरे से होता है |जहाँ भी अत्यधिक अँधेरा रहता हो वहां नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव होने की सम्भावना रहती है [कुछ उग्र नकारात्मक शक्तियां तीब्र गर्मी और प्रकाश जैसे लू आदि में भी अधिक प्रभावी होते है ]|यद्यपि यह पृथ्वी की आतंरिक ऊर्जा के उत्सर्जन पर भी निर्भर करता है जो सौरमंडल के परिप्रेक्ष्य में तो ऋणात्मक होती है किन्तु जीवन के परिप्रेक्ष्य में धनात्मक होती है |जहाँ अँधेरा तो हो पर पृथ्वी की आतंरिक ऊर्जा के उत्सर्जन का क्षेत्र हो वहां नकारात्मक उर्जायें कम हो जाती है |सभी शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग आदि पृथ्वी की आतंरिक ऊर्जा के वही उत्सर्जान क्षेत्र हैं ,इनकी स्थिति जानकार ही इन्हें साधना -आराधना स्थल के रूप में परिकल्पित और विक्सित किया गया की यहाँ से धनात्मकता की वृद्धि होती है और शक्ति प्राप्ति शीघ्र संभव होती है ,कम से कम नकारात्मक उर्जाओं का प्रभाव पड़ता है |
पृथ्वी के वातावरण में विभिन्न तरह की नकारात्मक उर्जायें रहती हैं ,जिन्हें हम विभिन्न नामों से जानते हैं |भूत-प्रेत-चुड़ैल आदि सबसे निचले स्तर की किन्तु सर्वाधिक क्रियाशील नकारात्मक शक्तियां हैं जो जीवन के ही अचानक नष्ट हो जाने से बनी हुई ऊर्जा परिपथ के नष्ट न हो पाने से बनते हैं |चुकी यह भी कभी जीवित हुआ करते थे अतः यह सबसे अधिक जीवन को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं | इनका गहरा सम्बन्ध व्यक्तियों से होने से यह उन्हें ही अधिक प्रभावित करते हैं और अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ती अथवा अपनी कष्ट प्रद योनी से मुक्ति हेतु प्रभावित करते रहते हैं ,चूंकि इनमे छटपटाहट अधिक होती है अतः क्रियाशील अधिक होते हैं |भूत-प्रेत से अधिक शक्तिशाली इसी योनी के अंतर्गत आने वाली कुछ अन्य शक्तियां ब्रह्म -बीर -शहीद- होते हैं ,जिनपर सामान्य सकारात्मक शक्तियों का कम प्रभाव पड़ता है और यह बहुत शक्तिशाली होते हैं ,क्योकि या तो यह अपना जीवन रहते बहुत शक्तिशाली शरीर तथा आत्मबल के रहे होते हैं अथवा बहुत धार्मिक और अलौकिक शक्तियां रखने वाले हुआ करते हैं ,ऐसे में इन पर सामान्य क्रियाओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और यह प्रभावित करने की कोसिस करते वाले की हानि कर सकते हैं | इनमे से ब्रह्म, शहीद आदि मंदिर आदि तक में प्रवेश कर जाते हैं ,यद्यपि बचने का प्रयास करते हैं ,इनके उपर पिशाच-पिशाचिनी-जिन्न जैसी उग्र शक्तियां आती हैं जिनका क्षरण हजारों हजार वर्षों तक नहीं होता और जो अपनी शक्ति बढाने तथा तामसिकता की पूर्ती के लिए जीवन को निशाना बनाते हैं |इनमे जिन्न अच्छे भी हो सकते हैं ,जबकि पिशाच तामसिक और कष्ट कारक ही होते हैं |ये बेवजह भी किसी के जीवन में हस्तक्षेप कर सकते हैं और इन्हें तंत्र साधक भी अपने वशीभूत करके अथवा नियंत्रण में लेकर तामसिक क्रियाएं संपन्न करते हैं |यह धनात्मक शक्ति से दूर रहते हैं किन्तु ऋणात्मक शक्ति में तामसिक शक्तियों के साथ यह हो सकते हैं |
उपरोक्त शक्तियों से ऊपर पृथ्वी की सतह की नकारात्मकता से उत्पन्न नैसर्गिक नकारात्मक शक्तियां आती हैं |इनमे डाकिनी- शाकिनी- बेताल- भैरव- भैरवियाँ आते हैं |यह सभी निचली सभी शक्तियों पर नियंत्रण कर सकते हैं ,और इन सब पर प्रकृति की परम शक्ति काली का नियंत्रण होता है ,अर्थात यह काली की शक्ति के अंतर्गत आते हैं |यह शक्तियां बेवजह कहीं भी हस्तक्षेप नहीं करती और इनके साक्षात्कार या वशीभूत या नियंत्रण के लिए गंभीर प्रयास करना पड़ता है ,इनमे बेताल-भैरव पुरुषात्मक और अग्नि तत्व प्रधान होते हैं |इनमे से कोई भी शक्ति मंदिर आदि में भी प्रवेश कर सकती है और किसी सामान्य तंत्र साधक द्वारा नियंत्रित नहीं की जा सकती ,बेताल की शक्ति रूद्र के उच्च स्तर के साधक के साथ भी परस्पर शक्ति संतुलन पर निर्भर करती है |इनमे से कोई भी शक्ति यदि वश में हो जाए तो भौतिक रूप से कुछ भी पाया जा सकता है |यहाँ तक की काल ज्ञान भी |इन सभी शक्तियों का क्षरण नहीं होता और यह नैसर्गिक नकारात्मक शक्तियां है ,फिर भी यह स्वयं में रहती हैं और ऋणात्मक शक्तियों यथा महाविद्याये-नव दुर्गाओं की सहायक होती हैं |इन्हें नकारात्मक में मूलतः इसलिए रखा जाता है की इनकी शक्ति रात्री अथवा अँधेरे में अधिक प्रबल होती है और यह सभी तामसिक शक्तियों के अंतर्गत आती हैं ,अन्यथा यह ऋणात्मक ही होती हैं |इसी प्रकार की समान्तर शक्तियां योगिनी-यक्षिणी-अप्सरा आदि भी होती हैं जो ऋणात्मक की सहायक शक्तियां हैं ,प्रकृति तामसिक होने पर भी इन्हें नकारात्मक में नहीं रखा जा सकता |
कभी कभी अपने पित्रादी ,कुलदेवता-देवी भी नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं ,अगर किसी प्रकार असंतुष्ट हुए तो |वर्मान परिवेश और वातावरण में इनका कोप अधिक देखने में आता है |यह खुद अगर नकारात्मक प्रभाव न भी उत्पन्न करें तो ये निष्क्रिय रहकर नकारात्मक प्रभाव को प्रभावित करने का मौका दे देते हैं और बचाव नहीं करते या उन्हें नहीं रोकते |आज ऐसी समस्याएं ७०% मामलों में देखि जा रही हैं |
नकारात्मक शक्तियों में हम घर के वास्तुदोष से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा को भी रखते हैं ,जिनका सीधा प्रभाव घर में रहने वाले सभी सदस्यों पर पड़ता है |घर के निर्माण में वास्तु का ख़याल न रखने पर ऊर्जा असंतुलन हो जाता है जो विभिन्न प्रकार से परेशानियां उत्पन्न करता है |मकान के सामने वेध होने से ,सीधे सामने रास्ते आने से भी नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न होता है और प्रभावित करता है |मकान पर पेड़ आदि की छाया ,मंदिर आदि की छाया भी प्रभावित करती है |
व्यक्ति विशेष के लिए अथवा स्थान विशेष के लिए ग्रहों का प्रभाव भी नकारात्मक हो सकता है ,इनमे कुछ ग्रह अधिकतर नकारात्मक प्रभाव प्रदान करने वाले होते है जबकि कुछ ग्रह कम नकारात्मक प्रभाव देते है ,,फिर भी कोई भी ग्रह सभी के लिए न तो शुभद होता है और न ही नकारात्मक ,यह उनकी स्थिति और ग्रहणकर्ता की स्थिति पर निर्भर करता है |जिस प्रकार सकारात्मक ऊर्जा के स्रोत शक्तिपीठों ,ज्योतिर्लिंगों के स्थान आदि होते हैं ,जहाँ पृथ्वी से सकारात्मक तरंगें उत्सर्जित होती रहती हैं ,उसी प्रकार कई स्थान ऐसे होते हैं जहाँ से नकारात्मक ऊर्जा या तरंगें उत्सर्जित होती रहती हैं |अधिकतर ऐसे स्थान वीरान हो जाया करते हैं |......................................................................हर-हर महादेव

कुलदेवता /देवी रुष्ट तो नहीं हैं ?

कहीं आपके कुलदेवता /कुलदेवी नाराज या निर्लिप्त तो नहीं ?
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              हिन्दू पारिवारिक आराध्य व्यवस्था में कुल देवता/कुलदेवी का स्थान सदैव से रहा है ,,प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज हैं जिनसे उनके गोत्र का पता चलता है ,बाद में कर्मानुसार इनका विभाजन वर्णों में हो गया विभिन्न कर्म करने के लिए ,जो बाद में उनकी विशिष्टता बन गया और जाती कहा जाने लगा ,,पूर्व के हमारे  कुलों अर्थात पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजित करना शुरू किया था ,ताकि एक आध्यात्मिक और पारलौकिक शक्ति कुलों की रक्षा करती रहे जिससे उनकी नकारात्मक शक्तियों/उर्जाओं और वायव्य बाधाओं से रक्षा होती रहे तथा वे निर्विघ्न अपने कर्म पथ पर अग्रसर रह उन्नति करते रहे |
           समय क्रम में परिवारों के एक दुसरे स्थानों पर स्थानांतरित होने ,धर्म परिवर्तन करने ,आक्रान्ताओं के भय से विस्थापित होने ,जानकार व्यक्ति के असमय मृत होने ,संस्कारों के क्षय होने ,विजातीयता पनपने ,इनके पीछे के कारण को न समझ पाने आदि के कारण बहुत से परिवार अपने कुल देवता /देवी को भूल गए अथवा उन्हें मालूम ही नहीं रहा की उनके कुल देवता /देवी  कौन हैं या किस प्रकार उनकी पूजा की जाती है ,इनमे पीढ़ियों से शहरों में रहने वाले परिवार अधिक हैं ,कुछ स्वयंभू  आधुनिक मानने वाले और हर बात में वैज्ञानिकता खोजने वालों ने भी अपने ज्ञान के गर्व में अथवा अपनी वर्त्तमान अच्छी स्थिति के गर्व में इन्हें छोड़ दिया या इनपर ध्यान नहीं दिया |
          कुल देवता /देवी की पूजा छोड़ने के बाद कुछ वर्षों तक तो कोई ख़ास अंतर नहीं समझ में आता ,किन्तु उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं ,नकारात्मक ऊर्जा ,वायव्य बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो जाता है ,उन्नति रुकने लगती है ,पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पाती ,संस्कारों का क्षय ,नैतिक पतन ,कलह, उपद्रव ,अशांति शुरू हो जाती हैं ,व्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता है कारण जल्दी नहीं पता चलता क्योकि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता है ,अतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है ,भाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है ,
           कुल देवता या देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा ,नकारात्मक ऊर्जा के परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैं ,यह पारिवारिक संस्कारों और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैं ,यही किसी भी ईष्ट को दी जाने वाली पूजा को ईष्ट तक पहुचाते हैं ,,यदि इन्हें पूजा नहीं मिल रही होती है तो यह नाराज भी हो सकते हैं और निर्लिप्त भी हो सकते हैं ,,ऐसे में आप किसी भी ईष्ट की आराधना करे वह उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता ,क्योकि सेतु कार्य करना बंद कर देता है ,,बाहरी बाधाये ,अभिचार आदि ,नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुचने लगती है ,,कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही ईष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है ,अर्थात पूजा न ईष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है ,,ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम शशक्त होने से होता है ,,
     कुलदेवता या देवी सम्बंधित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति ,उलटफेर ,विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं ,सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती है ,यह परिवार के अनुसार भिन्न समय होता है और भिन्न विशिष्ट पद्धति होती है ,,शादी-विवाह-संतानोत्पत्ति आदि होने पर इन्हें विशिष्ट पूजाएँ भी दी जाती हैं ,,,यदि यह सब बंद हो जाए तो या तो यह नाराज होते हैं या कोई मतलब न रख मूकदर्शक हो जाते हैं और परिवार बिना किसी सुरक्षा आवरण के पारलौकिक शक्तियों के लिए खुल जाता है ,परिवार में विभिन्न तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं ,,अतः प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को अपने कुल देवता या देवी को जानना चाहिए तथा यथायोग्य उन्हें पूजा प्रदान करनी चाहिए, जिससे परिवार की सुरक्षा -उन्नति होती रहे |................................................................हर-हर महादेव  

कैसे चुनें अपने आराध्य देवी देवता [आवश्यकतानुसार ] ?

ईष्ट देवी-देवता का चुनाव [व्यक्तिगत पूजा के सन्दर्भ में ]कैसे करें ?
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          प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक ,मानसिक संरचना ,उर्जा परिपथ और उसकी कार्य प्रणाली भिन्न होती है ,सभी में एक दूसरे के सापेक्ष सूक्ष्म अंतर अवश्य होता है ,ऐसे में किसी एक के ईष्ट ही दूसरे के भी ईष्ट कैसे हो सकते है ,,इष्ट का चुनाव व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं करना चाहिए या गुरु का मार्गदर्शन लेना चाहिए, ,सामान्यतया किसी ईष्ट के प्रति नैसर्गिक झुकाव भी कुछ हद तक संकेत देते हैं जो पूर्वकृत कर्मो और जन्मों से जुड़े हो सकते है ,इन झुकाओं का मतलब है इनकी कृपा आप पर नैसर्गिक रूप से है और ये आप पर प्रसन्न हैं और आपको अपनी और आकर्षित कर रहे हैं ,,अब आपको अपनी भौतिक आवश्यकताओं और सुचारू जीवन हेतु ,सामान्य कष्टों से मुक्ति हेतु ईष्ट का चुनाव करना है जो आज की उर्जा जरूरतों को भी संतुलित कर सके और मुक्ति में भी सहायक हो |,,
              ईष्ट का चुनाव ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति से ,,गुरु के निर्देश द्वारा या तंत्र के माध्यम से स्वयं किया जा सकता है | .
[१] .सामान्यतया कुंडली से ईष्ट का चुनाव करते समय लग्न -पंचम आदि भाव ,इनपर दृष्टि डालने वाले ग्रहों का तुलनात्मक अध्ययन कर ईष्ट का चुनाव किया जाता है ,.जब ग्रहों के अनुसार ईष्ट का चुनाव करे तो दुर्बल ग्रहों के देवता की पूजा करनी चाहिए [किन्तु वह कुंडली में शुभ हो ],,स्वामी ग्रह यदि दुर्बल है तो उसकी ही शक्ति चाहिए आपको ,,जो बढा हुआ है उसकी वस्तुओ का दान देना और दान न लेना उपयुक्त होता है |.एक तमाशा सामान्य देखा जाता है ,सामान्य मान्यता है की शनि ग्रह का शुभ फल तब प्राप्त होता है जब लोहा दान दिया जाए ,दूसरी मान्यता है की लोहे की अंगूठी पहनी जाए ,,दोनों एक साथ करवाते बहुत से ज्योतिषी विद्वान मिल जायेगे ,,सोचिये एक तरफ दान दे रहे है दूसरी तरफ पहन रहे है ,क्या अर्थ है इसका ,,वास्तव में शनि दुर्बल किन्तु आपके लिए घातक नहीं है तो लोहे की अंगूठी शुभ फल देगी ,ऐसे में दान नहीं करना चाहिए ,,यदि पहले से शनि घातक है और शक्ति बढा है तो लोहे की अंगूठी तो आपके लिए जानलेवा तक हो सकती है ,,ऐसे में व्यक्ति को तो लोहा दान देना चाहिए ,,अतः सदैव देखना चाहिए की जिस ग्रह को शक्ति की आवश्यकता है तो उसकी या उसके देवी -देवता की पूजा करे ,,आश्चर्य है की इतनी मूल बात लोग ध्यान नहीं देते और पूजा कर ऐसे शक्ति की भी ताकत बढाते है तो खुद उनके लिए घातक होता है ,इसीलिए तो ढेरो पूजा -आराधना के बाद भी कलह-झगड़े-पतन -अवरोध से मुक्ति नहीं मिलती ,जबकि सही ईष्ट जानकार दूसरा थोड़े से मानसिक पूजा से भी सफल हो जाता है ..
[२] .ईष्ट के चुनाव का दूसरा उपाय है ,योग्य गुरु से गुरु दीक्षा लेना और देवी -देवता या मंत्र का चुनाव उनके निर्देश के अनुसार करना …
[३] .ईष्ट के चुनाव का तीसरा और सर्वोत्कृष्ट उपाय है तंत्र का माध्यम ,,इसमें आप अँधेरे में बैठ जाए ,नाक की नोक पर भाव दृष्टि एकाग्र करते हुए अंगूठे को भृकुटी के मध्य आज्ञाचक्र पर तीन मिनट तक आँखे बंद करके रखे ,,दिमाग -मन बिलकुल शांत रखे ,तीन मिनट बाद वहा मानस पटल पर अंदर अँधेरा है ,कोई प्रकाश नहीं है ,कोई बिंदु प्रकाश नहीं है ,तो शिव जी या उनके चन्द्रमा की पूजा करे ,,अँधेरे का मतलब आपमें काली और भैरव के गुण बढे है और आपको शिव या उनके चन्द्रमा की आवश्यकता है ,यदि अन्य रंग का प्रकाश है ,तो उस प्रकाश के विपरीत देवी-देवता का चुनाव करे ,,यह प्रकाश या रंग यह व्यक्त करता है की सम्बंधित रंग या प्रकाश के ग्रह या देवी-देवता का गुण आपमें पहले से बढ़ा  है ,इसके विपरीत की आपको आवश्यकता है,जिससे संतुलन बन सके और आप सुखी हो सकें  .......................................................................................हर-हर महादेव

महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...