रविवार, 7 अक्टूबर 2018

परमात्मा / सदाशिव और विष्णु /राज राजेश्वर शिव में अंतर


परमात्मा / सदाशिव और विष्णु /राज राजेश्वर शिव में अंतर 
=============================
शिव और सदाशिव ,परमात्मा और विष्णु --इन दोनों में गुणात्मक अंतर है |सदाशिव अर्थात परमात्मा निर्गुण ,निराकार ,तत्व रूप है और शिव या राज राजेश्वर शिव या विष्णु एक सगुण रूप अर्ध नारीश्वर हैं |सदाशिव का स्थान हमारे शीर्ष के चन्द्रमा के मध्य है और शरीर के ऊर्जा चक्र के मध्य यह उसी प्रकार व्याप्त है ,जैसे हमारे केंद्र में हड्डी |अंतर केवल इतना है की यह धागे की भाँती सभी धाराओं के मध्य प्रवाहित होते हैं ,हड्डी स्थिर होता है |जितने प्रकार के जीव -जंतु ,फल ,पेड़ ,पौधे पाए जाते हैं ,उनमे तीन स्तर होते हैं |एक छिलके या चर्म का ,दूसरा मांस या गूदे का ,तीसरा हड्डी या कठोर काष्ठ का या बीज का |इन तीनो में तीन स्तर होते हैं ,बीज के ऊपर कठोर ,फिर गूदा ,फिर आतंरिक अंकुर होता है |इस अंकुर के मध्य शून्य होता है |यही शून्य सदाशिव है |यह हमारे हड्डियों के मध्य भी एक सूक्ष्म नलिका छिद्र की भाँती प्रवाहित होते रहते हैं |इडा-पिंगला के मध्य सुसुमना में प्रवाहित होते रहते हैं | राज राजेश्वर शिव --आत्मा के केंद्र में ,जीव -जंतु आदि सभी भौतिक ईकाई के केंद्र में विद्यमान होते हैं |इनकी उत्पत्ति काली एवं तारा की शक्ति से होती है |जब दो प्रकार की ऊर्जा धाराएं एक में विपरीत आवेश के आकर्षण में आपस में समाती हैं तो बीच में एक नाभिक या केंद्र की उत्पत्ति होती है ,यही केंद्र राज राजेश्वर शिव या विष्णु [वैदिक भाषा में ]कहलाता है |इसे भुवनेश्वरी भी कहते हैं |यही केंद्र अर्थात तीसरा बिंदु ही किसी भी इकाई का शासक ,पालक और सृष्टि को धारण करने वाला कहा जाता है |दो शंक्वाकार त्रिभुजीय ऊर्जा धाराओं के आपस में समाने पर दोनों के सिरों पर अर्थात उनके अपने मूल बिन्दुओं पर तो उनके अपने अपने आवेश होते हैं पर बीच में उदासीन की स्थिति बनती है और तीसरा बिंदु बनता है यही राज राजेश्वर शिव अथवा विष्णु का स्थान होता है और जो समस्त इकाई अर्थात उस जीव का नियंता या संचालक होता है |सदाशिव से ही दोनों ऊर्जा धाराएं उत्पन्न होती हैं ,जिनके आपसी क्रिया से तीसरे बिंदु याकेंद्र या नाभिक राज राजेश्वर शिव की उत्पत्ति होती है |यह दो ऊर्जा धाराओं धनात्मक और ऋणात्मक के बीच की कड़ी है और यह सदाशिव का सगुण रूप हो जाता है |इन तीन बिन्दुओं को ही त्रिमुखी ब्रह्मा ,त्रिगुणी महामाया ,पृथ्वी -आकास और सूर्य कहा जाता है |इन तीन बिदुओं से पांच ,पांच से नौ ऊर्जा बिंदु बन जाते हैं |इन्हें ही शक्ति के नौ रूप ,नव निधि ,नव शक्ति ,नव दुर्गा ,नव चक्र आदि कहा जाता है |हमारे सभी मूल देवी देवता का वास इन्ही नौ केन्द्रों में होता है |यहाँ जो शक्ति या ऊर्जा उत्पन्न होती है ,उसी से हमारा या किसी भी इकाई का शरीर बनता है ,क्रिया करता है और पोषित होता है |इसमें जिस चक्र की क्रियाशीलता अधिक होती है उससे अधिक तरंगे निकलती हैं और उसी केंद्र के गुणों के अनुसार उस जीव की प्रकृति बनती है |मूल या आदि रूप से उत्पन्न होने वाले दोनों बिंदु ऊपर और नीचे होते हैं ,मध्य में केंद्र होता है ,दोनों बिन्दुओं और केंद्र के मध्य तीन तीन केंद्र या बिंदु या चक्र बाद में विक्सित होते हैं |धनात्मक केंद्र को हम सहस्त्रार ,ऋणात्मक केंद्र को मूलाधार और मध्य केंद्र को अनाहत के नाम से जानते हैं |अर्थात राज राजेश्वर शिव या विष्णु या भुवनेश्वरी [तीनो एक ही हैं ,पथ के अनुसार नाम हैं ]अनाहत में आत्मा के केंद्र में स्थित हो सम्पूर्ण इकाई का संचालन करते हैं |सदाशिव पूरे इकाई के उतपत्ति कर्ता है ,पूरे इकाई में व्याप्त हैं ,सभी केन्द्रों में व्याप्त होते हैं |इस प्रकार सदाशिव सर्वत्र व्याप्त परम तत्व हैं जबकि उन्ही से उत्पन्न होते हैं उनके सगुण रूप राज राजेश्वर शिव जो इकाई पर नियंत्रण रखते हैं और संचालन करते हैं |...............................................................हर-हर महादेव 

भैरवी विद्या और भैरवी चक्र की उत्पत्ति [ Origin of Bhairavi Chakra]


भैरवी चक्र की उत्पत्ति 
================
सदाशिव या परमात्मा ही परम तत्व है |इनकी इच्छा से ही सृष्टि होती है |परम तत्व की इच्छा होने पर परमतत्व के अनंत फैलाव में किसी एक बिंदु पर विकोचन होता है और चक्रवात की भाँती एक अत्यंत सूक्ष्म भंवर बनता है |इसे शास्त्रों में परानाद कहा जाता है |यह क्रिया ठीक चक्रवात जैसी होती है |यह बिंदु ऊपर उठता है और उसे भरने के लिए तत्व की धाराएं दौड़ती हैं और भंवर चक्र बन जाता है जिसकी आकृति शंक्वाकार प्याले जैसी होती है |यह तीब्र गति से नाच रहा होता है |इससे इसके ऊपर आवेश उत्पन्न होता है |यही वह योनिरूपा महाकाली है ,जिसकी महत्ता वाममार्ग में सर्वाधिक है |यह आदिमाया ,आदिरूपा ,आदिशक्ति के रूप में उत्पन्न होती है ,क्योकि इसके बाद ही कोई उत्पत्ति होती है |इस शक्ति का रूप योनी रूपा है ,इसमें अन्य कोई आकृति नहीं होती |इस आकृति की प्रतिक्रया में इसके ऊपर एक इसी की उलटी संरचना उत्पन्न होती है [विपरीत आवेश के खिचाव से ],जिस पर भिन्न प्रकार के [विपरीत] आवेश होते हैं |यह वह शिवलिंग है ,जो योनी के आकर्षण में उत्पन्न होता है |विपरीत आवेश के कारण दोनों एक दुसरे में समा जाते हैं और एक जीव की उत्पत्ति होती है |दोनों आवेशों के एक दुसरे में समाने से जो आकृति बनती है यही भैरवी चक्र है |अर्थात जो परिपथ उस सदाशिव के अनंत फैलाव में उत्पन्न होता है ,यही भैरवी चक्र है और इसी चक्र से महामाया प्रकृति की उत्पत्ति होती है और यही चक्र समस्त सृष्टि के अस्तित्व ,क्रिया ,विकास ,और इसके अन्दर उत्पन्न होने वाली समस्त इकाइयों की उत्पत्ति ,क्रिया और विकास का जनक है |इसके एक छोर पर काली ,दुसरे छोर पर पार्वती ,बीच में भौतिक राज राजेश्वर शिव एवं ऊपर शीर्ष पर सती होती हैं |इसके अन्दर एक नाभिक ,दो अलग अलग ध्रुवों पर दो अलग अलग ऊर्जा बिंदु धन और ऋण होती हैं ,धन बिंदु के ऊपर एक प्रभा होती है |यह मूल भैरवी चक्र है |इसमें ऊर्जा धाराएं चलती हैं और इसकी एक व्यवस्था होती है |इसी से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और यह समस्त सृष्टि के अन्दर पायी जाती है |सभी देवी-देवता ,यक्ष ,किन्नर ,जीव-जंतु ,तारे ,नक्षत्र ,ग्रह ,उपग्रह और यह ब्रह्माण्ड एवं इसकी सभी उत्पत्तियां इस चक्र में इसी चक्र की आकृति में होती है |इसलिए दो त्रिकोनों के इस मेल को माँ कहा जाता है |यह आदि जननी का संकेत सूत्र है |यही भैरवी चक्र है |इसी को श्री विद्या या श्री चक्र भी कहा जाता है |सभी यंत्रों के मूल में त्रिकोण एक ऊर्जा धारा [आवेश ] को व्यक्त करता है ,जो आदि रूपा उत्पन्न होने वाली महामाया अथवा महाकाली का संकेत देता है |जबकि दो त्रिकोण एक दुसरे में समाये हुए उसकी पूर्णता और उससे उत्पत्ति को व्यक्त करतें हैं |सभी शक्ति यंत्रों में भैरवी चक्र होते है , त्रिकोण होते हैं |यह मूल शक्ति के संकेतक हैं |अन्य दल अथवा आवरण आदि चित्र उससे जुडी भिन्न शक्तियों अथवा गुणों को व्यक्त करते हैं |
भैरवी चक्र की पूजा किसी किसी रूप में तंत्र मार्ग में होती है ,क्योकि यही शक्ति है ,इसी से सृष्टि की उत्पत्ति है |परम तत्व तो निर्लिप्त रहता है |उसमे सृष्टि की ईच्छा होने पर ,उसमे स्थित [समाहित ]शक्ति उसी से एक भंवर उत्पन्न करती है अपने आवेश के साथ ,फिर उसी तत्त्व से विपरीत आवेश का भंवर उससे आकर्षित हो बनता है ,जो एक दुसरे में समा जाते है और तीसरे बिंदु नाभिक के साथ एक मूल परिपथ के साथ सृष्टि प्रारम्भ होती है |इसीलिए सभी में मूल रूप से शुरू से ही यह तीनो बिंदु से ही रचना प्रारम्भ होती है |इसे व्यक्त करने के लिए एक त्रिभुज में दुसरे त्रिभुज को दर्शाया जाता है ,जबकि यह दोनों ही त्रिभुज शंक्वाकार एक दुसरे में समाये होते हैं और क्रिया करते हैं |इसी भैरवी चक्र की पूजा को तंत्र में सर्वाधिक महत्व दिया जाता है |इसकी पूजा में स्त्री और पुरुष के दो गुणों के संयोग से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया जाता है ,माध्यम बनाया जाता है सृष्टि उत्पन्न करने की शक्ति अर्थात काम भाव को |अर्थात तंत्र में सृष्टि उत्पन्न करने वाली शक्ति से ही सृष्टि के नियंता तक पहुचने का मार्ग बनाया जाता है |परम शक्तिशाली जनन क्षमता को ही मुक्ति का माध्यम बनाया जाता है |मनुष्य की सृष्टि करने वाली शक्ति को ही मुक्ति की शक्ति बना दिया जाता है अर्थात उस शक्ति को मुक्ति मार्ग के लिए उपयोग किया जाता है |यह स्वाभाविक और प्राकृतिक क्रिया शीघ्र शक्ति प्राप्ति का ,सिद्धि का ,मुक्ति का माध्यम बन जाती है |.........................................................................हर-हर महादेव 

भैरवी विद्या [कुंडलिनी तंत्र ] और परम तत्व [ Bhairavi Tantra and Parambrahma]


परमब्रह्म /परमात्मा /सदाशिव /परमतत्व 
================================
जब सृष्टि नहीं होती ,तो केवल एक ही तत्व का अस्तित्व होता है |वह है सदाशिव ,जिन्हें वैदिक ऋषि परमात्मा अर्थात परम्सार कहते हैं |उपनिषदों में इसे परमतत्व कहा गया है |इसे परब्रह्म एवं परादेव ,आदिनाथ ,आदिदेव ,देवाधिदेव भी कहा जाता है ,क्योकि सबकी उत्पत्ति इसी ें है ,इसी के कारण इसी से होती है और इसी अमृत तत्व से सबका जीवन चक्र चलता है |जिसे वेद परब्रह्म [परमात्मा ] कहता है ,उसे ही शैव मार्गी शिव के नाम से जानते हैं |उसके पांच गुण हैं |वह सर्वज्ञ है ,सभी कृत्यों को करने में समर्थ है ,वह सर्वेश्वर है ,वह मलरहित निर्विकार है ,वह अद्वय है ,अर्थात उसके सिवा दूसरा कोई भी नहीं है |इस प्रकार सभी आध्यात्मिक रहस्यों के बाद ज्ञात होता है की कुछ बन रहा है , ही नष्ट हो रहा है |सब इसी तत्त्व में चल रहा है |सारी सृष्टि इसी तत्त्व का अनंत फैलाव मात्र है |समस्त सृष्टि इसी तत्व की धाराओं से बना परिपथ है और यह चक्रवात की भाँती उत्पन्न होकर विशालतम होती चली जाती है |
सदाशिव की कोई आकृति नहीं है |इनकी जो छवि कैलेंडरों एवं मूर्तियों में दिखाई देती है ,वे इनके विभिन्न गुणों को प्रदर्शित करने वाली छवियाँ हैं |सदाशिव एक तत्व का नाम है ,जो परम सूक्ष्म ,परम विरल .अनश्वर ,सर्वत्र व्याप्त रहने वाला एक तेजोमय तत्व है |एक ऐसा तत्व जो सांसारिक नहीं है |इस सृष्टि में उस जैसा कुछ भी नहीं है |यह अजन्मा है अर्थात इसकी उत्पत्ति नहीं होती |यह सदा शाश्वत है |इसी प्रकार यह तत्व नष्ट भी नहीं होता [यह आत्मा नहीं है ,आत्मा भी इसी से अस्तित्व बनाती है ]|यह सांसारिक नहीं है पर इस प्रकृति और संसार की उत्पत्ति इसी से होती है |इसमें जीवन नहीं है ,पर यह सभी के जीवन को उत्पन्न करके पोषित करता है और जीवित रखता है |इसमें चेतना नहीं है किन्तु समस्त चेतना की उत्पत्ति इसी से होती है |यह कोई जीव नहीं है ,पर यह सब कुछ जानता है |इसमें भूत ,भविष्य और वर्त्तमान का सभी कुछ छिपा [अव्यक्त ] रहता है |यह अनंत तक फैला हुआ एक विचित्र और अद्भुत तत्व है |अजब लीला है इस तत्व की ,जिसको जानने के बाद वैदिक ऋषियों के मुह से निकला --हम नहीं कह सकते इसके बारे में |इस लीला का वर्णन नहीं किया जा सकता |यह समस्त ज्ञान ,बुद्धि और चेतना का हरण कर लेती है |हम कैसे कहें ? वाणी ,ज्ञान ,बुद्धि ,चेतना और सवेदना भी तो इसी से उत्पन्न होते हैं ,इससे स्थूल हैं |इन्ही से इसका वर्णन किस प्रकार किया जा सकता है |........[क्रमशः ]............................................हर-हर महादेव 

भैरवी तंत्र [कुंडलिनी तंत्र ]और कुंडलिनी योग [Bhairavi Tantra and Kundlini Yoga]


कुंडलिनी योग और कुंडलिनी तंत्र [भैरवी तंत्र ]
============================
कुंडलिनी जागरण अथवा कुंडलिनी साधन के दो मुख्य मार्ग हैं |योग द्वारा कुंडलिनी जागरण और तंत्र द्वारा कुंडलिनी जागरण |योग द्वारा कुंडलिनी साधना को कुंडलिनी योग कहते हैं और तंत्र द्वारा कुंडलिनी साधना को कुंडलिनी तंत्र साधना कहते हैं |दोनों पद्धतियाँ यद्यपि एक दुसरे से कई प्रकार से मिली हुई हैं पर इनमे मूलभूत और व्यावहारिक अंतर भी है |कुंडलिनी तंत्र में योग के कई अंश प्राप्त होते हैं तो कुंडलिनी योग में तंत्र के विभिन्न सूत्रों का प्रयोग होता है |इनमे मूल भूत अंतर यह है की योग ,सहस्त्रार से नीचे मूलाधार की ओर चलते हुए कुंडलिनी जागरण को महत्त्व देता है ,जबकि तंत्र मूलाधार को पहले जाग्रत करके तब उपर उठने की बात करता है |
योग मार्ग ,कुंडलिनी जागरण के लिए कठिन तपस्या ,मन और विचारों पर पूर्ण नियंत्रण ,भैतिकता ,विलाश ,कामुकता ,विषयात्मक संबंधों का पूर्ण परित्याग ,कठिन यौगिक शारीरिक क्रियाओं द्वारा खुद को पूर्ण नियंत्रित कर कुंडलिनी जागरण की बात करता है ,जबकि तंत्र ,योग द्वारा परित्यक्त जनन ऊर्जा ,लैंगिक सम्बन्ध ,स्त्री -पुरुष सम्भोग ,संतानोत्पत्ति क्षमता का ही उपयोग कर कुंडलिनी जागरण कर सृष्टि उत्पन्न करने की क्षमता से सृष्टिकर्ता तक पहुँचने की बात करता है |इसलिए दोनों दो छोरों से चलते हैं |योग मार्ग खुद को नियंत्रित ,विरक्त कर सहस्त्रार से नीचे की ओर चलते हुए मूलाधार में सुप्त कुंडलिनी पर दबाव बना उसे जगाता है और फिर उर्ध्वगामी करता है ,जबकि तंत्र मूलाधार को ही प्रथम लक्ष्य बनाता है और इसे सशक्त करते हुए यहाँ स्थित ग्रंथियों ,अंगों के उपयोग से ही इसे जाग्रत कर कुंडलिनी को उर्ध्वगामी करते हुए विभिन्न चक्रों का भेदन कर सहस्त्रार तक लाता है |
मार्ग कोई भी हो सर्वाधिक कठिन मूलाधार का जागरण ही है |इसके जागरण पर भारी परिवर्तन होता है क्योकि यहीं कुंडलिनी शक्ति सुप्तावस्था में रहती है |योग द्वारा चूंकि व्यक्ति पहले से ही नियंत्रित हुआ रहता है अतः उसपर इसके जागरण से बहुत मानसिक -शारीरिक प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु तंत्र में चूंकि यहीं से शुरुआत होती है अतः यह आग से खेलने के समान हो जाता है |99 प्रतिशत साधक इस आग में जल भी जाते हैं |तंत्र में शारीरिक क्रियाओं ,यौनांगों ,शारीरिक सम्बन्ध ,जनन क्षमता ,स्त्री का उपयोग होता है और इन्हें तीव्र से तीव्रतर किया जाता है ,ताकि यह कुंडलिनी को उद्वेलित कर जगा दें |इस प्रक्रिया में ऊर्जा न संभलने से व्यक्ति की स्थिति महिसासुर सी हो जाती है जो कुछ नहीं पहचानता और अधिकतर इस स्थिति में पतित हो जाते हैं |तंत्र यहाँ ऊर्जा उत्पन्न कर उसे बढ़ाकर नियंत्रित कर आगे बढने की बात करता है अतः यह मार्ग अधिक कठिन हो जाता है ,जिससे केवल कुछ साधक ही सफल हो पाते हैं |इस मार्ग में स्त्री का उपयोग किया जाता है जिसे यहाँ भैरवी कहते हैं और साधक भैरव स्वरुप होता है ,अतः इस मार्ग को भैरवी तंत्र भी कहते हैं |......................................................हर-हर महादेव


महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...