सोमवार, 25 दिसंबर 2017

हत्था जोड़ी के चमत्कार

समस्या निवारण 
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यदि आपके पास हत्था जोड़ी है और आपको कोई लाभ नहीं हुआ तो उसे सिंदूर डालकर चाँदी की डिब्बी में रखें प्रतिदिन दो माला का जाप करें ऐसा करने से समस्त समस्याओं में लाभ मिलेगा।
मंत्र - श्रीं ह्रीं क्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं फट।
 लक्ष्मी प्राप्ति हेतु
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प्राण प्रतिष्ठित की हुई हत्था जोड़ी लेकर मंगलवार के दिन लाल सिंदूर में डालकर पूजा स्थल पर रख दें. और प्रतिदिन संध्या में घी का दीपक जलाकर इस मंत्र का जाप करें. व्यापारी अपने तिजोरी में रखें।
मंत्र - ह्रीं ऐश्वर्य श्रीं धन धान्याधिपत्यै ऐं पूर्णत्य लक्ष्मी सिद्धये नमः।
घर में शांति एवं दुर्घटना से सुरक्षा हेतु
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समाधान - प्राण प्रतिष्ठित की हुई हत्था जोड़ी लेकर पीले सिंदूर में डालकर शनिवार के दिन ब्रह्म मुहुर्त में तिल तेल का दीपक जलाकर एक माला जाप करें ऐसा प्रति शनिवार करें
मन्त्र - ह्रीं श्रीं श्रियै फट।
 तंत्र टोने का उतारा दीपावली में 
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कोई व्यक्ति डिप्रेशन में या मानसिक संतुलन खो देता है या किसी शारीरिक व्याधि से पीड़ित है अथवा कोई किया कराया के कारण परेशानी है तो प्राण प्रतिष्ठित की हुई हत्था जोड़ी लेकर पीले सिंदूर में डालकर एक घी का दीपक जलाएं. दीपावली, होली, अमावस्या या किसी भी कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन 21 माला मंत्र का जाप करें।
मंत्र - ह्रीं क्रीं क्रीं क्रीं हुम् फट।
और अंत में व्यक्ति के ऊपर से उतार कर किसी सुनसान स्थान में गाड़ दें। 
(उतारे का प्रयोग मात्र जानकारी हेतु दिया है, उतारा पूरी विधि से होगा अतः उतारा किसी योग्य जानकार व्यक्ति से ही करवाएं अन्यथा निस्तारण के वक्त उक्त शक्ति पलटवार कर सकती है।
 राजनीतिक या मान सम्मान मुकदमा में सफलता के लिए
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प्राण प्रतिष्ठित हत्था जोड़ी वशीकरण की अद्भुत शक्ति होती है. इसे अष्टगंध एवं लाल सिंदूर में डालकर पीले वस्त्र में लपेट कर दायीं भुजा में बाँधकर या दायीं जेब में रख कर किसी शुभ कार्य में अपने साथ ले जायें तो सफलता अवश्य मिलेगी। इसके लिए प्रतिदिन तीन माला का जाप 11 दीप प्रज्जवलित कर करें।
मंत्र - ह्रीं क्लीं फट।
 तंत्र बाधा और हत्थाजोड़ी
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 तंत्र बाधा के कारण बदन ,कमर दर्द है तो प्राण प्रतिष्ठित हत्थाजोड़ी को शनिवार को 11 माला निम्न मन्त्र जप कर लाल धागे में पिरोकर कमर में बांधें |दर्द और तंत्र पीड़ा से राहत मिलेगी |
मन्त्र- ह्रीं क्लीं ह्रीं स्वाहा।
सर्व सुख समृद्धि के लिए
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प्राण प्रतिष्ठित हत्था जोड़ी को सिंदूर में लाल वस्त्र में लपेटकर पूजा स्थान में रख मंत्र का जाप करें। हवन करें

मंत्र - श्रीं ह्रीं क्रीं ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं फट।........................................................हर-हर महादेव 

रविवार, 24 दिसंबर 2017

गुग्गल :: क्या होता है ?

क्या होता है गुग्गल
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गुग्गल एक औषधीय झाड़ी है जिसका  वैज्ञानिक नाम  कोम्मिफोरा मुकुल है | गुग्गल एक दिव्य औषधी है। गुग्गल रेजिन का उपयोग गठिया रोग, तंत्रिका संबंधी रोग, बवासीर, अस्थमा, पथरी, छाले तथा मूत्रवर्धक रोग के उपचार में किया जाता है। इसका उपयोग सुगंध, इत्र औषधीय में भी किया जाता है।उपयोगी भाग छाल और रेजिन [गोंड] होता है |गुग्गल पूजन सामग्रियों में उपयोग होता है और धूनी जलाने ,हवंन करने और सुगन्धित वातावरण में उपयोग होता है |
यह मूल रूप से एशिया अफ्रीका का पौधा है। यह भारत के उष्णकटिबंघीय क्षेत्रों, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और प्रशांत महासागर में पाया जाता है। भारत में यह .प्र., राजस्थान, तमिलनाडु, आसाम, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ में पाया जाता है। मध्यप्रदेश में यह ग्वालियर और मुरैना जिलों में पाया जाता है। गुग्गल ब्रूसेरेसी कुल का एक बहुशाकीय झाड़ीनुमा पौधा है। यह पौधा छोटा होता है एवं शीतकाल और गीष्मकाल में धीमी गति से बढ़ता है। इसके विकास के लिए वर्षा ऋतु उत्तम रहती है। अधिक कटाई होने से यह आसानी से प्राप्त नहीं होता है। इसकी तनों शाखाओं से जो गोंद निकलता है वही गुग्गल कहलाता है। गुग्गल उपयोग से कोई खतरनाक प्रभाव नहीं होता है फिर इसका लंबे समय तक उपयोग करने से हल्के पेट दर्द की शिकायत होती है। इसका दीर्घ कालीन उपयोग गलग्रंथि, थायराइट और गर्भाशय को प्रभावित करता है अत: इसका उपयोग गर्भधारण के दौरान नहीं करना चाहिए। अग्रेंजी में इसे इण्डियन बेदेलिया भी कहते हैं। रेजिन का रंग हल्का पीला होता है परन्तु शुद्ध रेजिन पारदर्शी होता है।
 यह एक झाड़ीनुमा पौधा है, जिसकी छाल कठोर होती है। शाखायें श्वेत, मुलायम और सुगंधित होती है। शाखायें मुडी हुई, गांठेदार, शीर्ष की ओर नुकीली और राख के रंग की होती है। तनों पर कागज जैसी एक पतली झिल्ली होती है। पत्तियाँ चिकनी सपत्र होती है, जिसमें 1-3 पत्रक होते है। फूल भूरे से गहरे लाल रंग के होते है। फूल नर मादा दो प्रकार के होते है। फूल 2-3 के समूह में होते है। फूल जनवरी मार्च माह में आते है। फल अण्डाकार, 6-8 मिमी व्यास के होते है और पकने पर लाल और दो भागों में टूट जाते है। फल मार्च मई माह में आते है।
 गुग्गल की झाडी़ आठ वर्ष में तैयार हो जाती है। गुग्गल प्राप्त करने का उपयुक्त समय मार्च दिसम्बर होता है। दोहन द्वारा गुग्गल गोंद प्राप्त करते है। 10-15 दिन के अन्तराल गोंद को एकत्र करते है।

गोंद के दोहन के लिए तने में तेज चाकू से तीन इंच गहरा चीरा लगाया जाता है। तनों में उपस्थित गुग्गल रिस कर बाहर निकलते लगता है और हवा से सूख जाता है। चीरा लगाते समय सावधानी रखनी चाहिए। यदि चीरा बहुत गहरा लगता है, तो पौधा मर जाता है या आगामी वर्षों में गुग्गल कम मात्रा में प्राप्त होता है। सामान्यत: चीरा नवम्बर माह के बाद लेकिन अप्रैल माह के पहले लगाया जाता है। शुध्द रेजिन पारदर्शी होता है जिस पर पतली फिल्म होती है किन्तु अधिक मात्रा में होने के कारण पारभाषी और अस्पष्ट दिखाई देता है। यह केस्टर तेल, तारपीन तेल में पूर्णत: घुलनशील होता है। टपकते हुये गुग्गल को मिट्टी के बर्तन में इकट्ठा करते है। गुग्गल को कई रूपों में उपयोग किया जाता है जैसे § गुग्गल कँलोस्ट्राल § गुग्गल एक्सट्रेक्ट § गुग्गल गम § त्रिफला गुग्गल|.....................................................................हर-हर महादेव 

गंगा जल अमृत है

 गंगा जल अमृत है
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सामान्य जनमानस की यह उक्ति है की गंगाजल अमृत है |क्यों और कैसे |क्यों गंगा जल खराब  नहीं होता |अमेरिका में एक लीटर गंगाजल 250 डालर में क्यों मिलता है।ऐसा इसलिए है की इसमें चमत्कारी गुण छिपे होते हैं जिन्हें अभी तक भी वैज्ञानिक नहीं खोज पाए पूरी तरह से |जितने लोग ,जितने शोध उतने तरह की बातें |यह चमत्कार है ,दैवीय कृपा है या औषधीय गुण ,लेकिन गंगाजल काम अमृत की तरह ही करता है |विभिन्न रोगों को ठीक करने की इसमें अद्भुत क्षमता है |दीर्घायु देने की इसमें अद्भुत क्षमता है |गंगा को पवित्र माना जाता है ,इनके किस्से कहानियां पुरानों में मिलती हैं |अनेक किवदंतियां प्रचलित हैं |इनके अमृत तत्व को वैज्ञानिक प्रमाणित करते हैं ,धर्म और पौराणिक कथाएं तो अपनी जगह हैं |अतः आज के समय में यह साक्षात् अमृत तुल्य है |
कई इतिहासकार बताते हैं कि सम्राट अकबर स्वयं तो गंगा जल का सेवन करते ही थे, मेहमानों को भी गंगा जल पिलाते थे। इतिहासकार लिखते हैं कि अंग्रेज जब कलकत्ता से वापस इंग्लैंड जाते थे, तो पीने के लिए जहाज में गंगा का पानी ले जाते थे, क्योंकि वह सड़ता नहीं था। इसके विपरीत अंग्रेज जो पानी अपने देश से लाते थे वह रास्ते में ही सड़ जाता था।
करीब सवा सौ साल पहले आगरा में तैनात ब्रिटिश डाक्टर एमई हॉकिन ने वैज्ञानिक परीक्षण से सिद्ध किया था कि हैजे का बैक्टीरिया गंगा के पानी में डालने पर कुछ ही देर में मर गया।
दिलचस्प ये है कि इस समय भी वैज्ञानिक पाते हैं कि गंगा में बैक्टीरिया को मारने की क्षमता है। लखनऊ के नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट एनबीआरआई के निदेशक डॉक्टर चंद्र शेखर नौटियाल ने एक अनुसंधान में प्रमाणित किया है कि गंगा के पानी में बीमारी पैदा करने वाले कोलाई बैक्टीरिया को मारने की क्षमता बरकरार है। डॉ नौटियाल का इस विषय में कहना है कि गंगा जल में यह शक्ति गंगोत्री और हिमालय से आती है। गंगा जब हिमालय से आती है तो कई तरह की मिट्टी, कई तरह के खनिज, कई तरह की जड़ी बूटियों से मिलती मिलाती है। कुल मिलाकर कुछ ऐसा मिश्रण बनता जिसे हम अभी नहीं समझ पाए हैं।
डॉक्टर नौटियाल ने परीक्षण के लिए तीन तरह का गंगा जल लिया था। उन्होंने तीनों तरह के गंगा जल में -कोलाई बैक्टीरिया डाला। नौटियाल ने पाया कि ताजे गंगा पानी में बैक्टीरिया तीन दिन जीवित रहा, आठ दिन पुराने पानी में एक एक हफ्ते और सोलह साल पुराने पानी में 15 दिन। यानी तीनों तरह के गंगा जल में कोलाई बैक्टीरिया जीवित नहीं रह पाया।
वैज्ञानिक कहते हैं कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफाज वायरस होते हैं। ये वायरस बैक्टीरिया की तादाद बढ़ते ही सक्रिय होते हैं और बैक्टीरिया को मारने के बाद फिर छिप जाते हैं।
मगर सबसे महत्वपूर्ण सवाल इस बात की पहचान करना है कि गंगा के पानी में रोगाणुओं को मारने की यह अद्भुत क्षमता कहाँ से आती है?
दूसरी ओर एक लंबे अरसे से गंगा पर शोध करने वाले आईआईटी रुड़की में पर्यावरण विज्ञान के रिटायर्ड प्रोफेसर देवेंद्र स्वरुप भार्गव का कहना है कि गंगा को साफ रखने वाला यह तत्व गंगा की तलहटी में ही सब जगह मौजूद है। डाक्टर भार्गव कहते हैं कि गंगा के पानी में वातावरण से आक्सीजन सोखने की अद्भुत क्षमता है। भार्गव का कहना है कि दूसरी नदियों के मुकाबले गंगा में सड़ने वाली गंदगी को हजम करने की क्षमता 15 से 20 गुना ज्यादा है।
गंगा माता इसलिए है कि गंगाजल अमृत है, इसलिए उसमें मुर्दे, या शव की राख और अस्थियां विसर्जित नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मोक्ष कर्मो के आधार पर मिलता है। भगवान इतना अन्यायकारी नहीं हो सकता कि किसी लालच या कर्मकांड से कोई गुनाह माफ कर देगा। जैसी करनी वैसी भरनी!
गंगा तव दर्शनार्थ मुक्ति:। अर्थात गंगा के दर्शन मात्र से मुक्ति मिल जाती है।....................................................हर-हर महादेव  


महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...