सोमवार, 30 अप्रैल 2018

ज्ञान मुद्रा [GYANA MUDRA]


:::::::::: ज्ञान मुद्रा :::::::::
==================
अनिद्रा-क्रोध-मानसिक विचलन का नाश ,बुद्धि -स्मरणशक्ति का विकास
-----------------------------------------------------------
हाथ की तर्जनी (अंगूठे केसाथ वालीअंगुली केअग्रभाग (सिरेको अंगूठे केअग्रभाग के साथ मिलाकररखने और हल्का-सा दबावदेने से ज्ञान मुद्रा बनती है|इस मुद्रा में दबाना जरूरीनहीं हैबाकी उंगलियां सहजरूप से सीधी रखेंयहअत्यधिक महत्वपूर्ण अंगुली-मुद्रा हैइस मुद्रा का सम्पूर्णस्नायुमण्डल और मस्तिष्कपर बड़ा ही हितकारी प्रभावपड़ता है|
• ज्ञान मुद्रा किसी भी आसन या स्थिति में की जा सकती हैध्यान के समय इसे पद्मासन में करनासर्वश्रेष्ठ माना गया हैइसे आप दोनों हाथों सेचलते-फिरतेउठते-बैठतेसोते-जागतेगृहस्थी केकार्य करते समय या आराम के क्षणों मेंजब चाहें किसी भी समयकिसी भी स्थिति में और कहीं भीकर सकते हैं|
• इसे अधिक से-अधिक समय तक किया जा सकता हैइस मुद्रा के लिए समय की कोई सीमा नहींहै|
• हस्तरेखा विज्ञान की दृष्टि सेइस मुद्रा के नियमित अभ्यास से जीवन रेखा और बुध रेखा के दोषदूर होते हैं तथा अविकसित शुक्र पर्वत का विकास होता है|
ज्ञान मुद्रा समस्त स्नायुमंडल को सशक्त बनाती हैविशेषकरमानसिक तनाव के कारण होनेवालेदुप्रभावों को दूर करके मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को सबल करती हैज्ञान मुद्र के निरंतर अभ्यास सेमस्तिष्क की सभी विकृतियां और रोग दूर हो जाते हैंअनिद्रा रोग में यह मुद्रा अत्यंत कारगर सिद्धहोती हैमस्तिष्क शुद्ध और विकसित होता हैमन शांत हो जाता हैचेहरे पर अपूर्व प्रसन्नताझलकने लगती है|
• ज्ञान मुद्रा मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होती हैतर्जनी अंगुली और अंगूठा जहां एक एकदूसरे को स्पर्श करते हैंहल्का-सा नाड़ी स्पन्दन महसूस होता हैवहां ध्यान लगाने से चित्त काभटकना बंद होकर मन एकाग्र हो जाता है|
• ज्ञान मुद्रा विद्यार्थियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैइसके अभ्यास से स्मरण शक्तिउन्नत और बुद्धि तेज होती हैसाधना के क्षेत्र में साधक द्वारा लगातार ज्ञान मुद्रा करने से उसकाज्ञान-नेत्र (शिव-नेत्रखुल सकता हैअन्तःदृष्टि प्राप्त होकर छठी इंद्रिय का विकास हो सकता है|दिव्य-चक्षु के खुलने से साधक त्रिकाल की घटनाओं को यथावत् देख सकने तथा दूसरे के मन कीबातें जान सकने की क्षमता प्राप्त कर लेता है|
ज्ञान मुद्रा से स्मरण-शक्तिका विकास होता है और ज्ञानकी वृद्धि होती हैपढ़नेमें मन लगता है तथाअनिद्राका नाशस्वभावमें परिवर्तनअध्यात्म-शक्तिका विकास और क्रोधका नाश होता है 
सावधानी:- खान-पान सात्त्विक रखना चाहियेपान-परागसुपारीजर्दा इत्यादिका सेवन  करे ।अति उष्ण और अति शीतल पेय पदार्थोंका सेवन  करे 
Gyan Mudra: In this position the fingers are held with the tip of the index finger touching the tip of the thumb and the remaining three fingers nearly straight--kind of like an "OK" sign, except the palms of each hand are pointed up or front. This mudra is known as the “seal of knowledge”. It is one of the most commonly used and highly recognized mudras.
When the first finger and thumb connect at the tips it is thought to encourage wisdom. Circulation in the brain is also increased which helps boost concentration and inspire creativity.
This mudra is good for: stresses and strains, insomnia, emotional instability, indecisiveness, excessive anger, idleness, laziness, indolence, and is a great help in increasing memory and I.Q. It can help cure sleeplessness and get one off sleeping pills where these are being taken.
There are a number of variations of this mudra for higher and higher degrees of attainment e.g. Purna Gyan Mudra, Vairagya Mudra, Abhay Mudra, Varad Mudra, Dhyan Mudra, Mahagyan Mudra. As one keeps attaining higher and higher levels of the mind, the mudra's change ..........................................................................हर-हर महादेव 

पंच तत्व नियंत्रक मुद्राएं और लाभ


पंच तत्व[जल,वायु,अग्नि,पृथ्वी,आकाश] नियंत्रक मुद्राएं और लाभ
==========================================
हाथों की उंगलियों को एकदूसरे से विशेष प्रकार सेमिलानेस्पर्श करनेदबानेअथवा मरोड़ने से विभिन्नप्रकार की मुद्राएं बनती हैं|इस प्रकार केवल उंगलियों को एक-दूसरे के साथ किसी विशेष स्थिति में रखने या परस्पर सटादेने भर की क्रिया मात्र से ही शरीर में भिन्न-भिन्न तत्वों का प्रभाव आवश्यकतानुसार घटा-बढ़ासकते हैं और पंच तत्व नियंत्रक उंगली-मुद्राओं के नियमित अभ्यास के द्वारा तत्वों में संतुलनलाकर स्वस्थ रह सकते हैंसारांश यह है कि प्रकृति के समान ही मानव शरीर पंच तत्वों से बनाहैआरोग्य का आधार इन पंच तत्वों का संतुलन हैविभिन्न उंगली-मुद्राएं शरीर में चेतना केशक्ति केंद्रों के रिमोट कंट्रोल बटन के समान हैंउनके उचित अभ्यास से स्वास्थ्य-रक्षा औररोग-निवारणदोनों संभव हैं| षट्‌चक्रों का संबंध पंच तत्वों से है और ये मुद्राएं पांच तत्वों कोसंतुलित करती हैंसद्गुरु के सान्निध्य में इन मुद्राओं का प्रयोग कर साधक प्रसुप्त अनंतसंभावनाओं को जाग्रत करने में सफल हो जाता हैइनसे प्रसुप्त चक्रों में विशेष आघात होता है,जिससे वे चालित हो जाते हैं| उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को अचानक दिल का दौरा पड़ा हैऔर उसके पास तत्क्षण कोई प्रभावशाली दवा नहीं हैऐसी स्थिति मेंभले ही उसने किसीव्यक्ति को डॉक्टर बुलाने भेज दिया होयदि वह तत्काल अपने दोनों हाथों से अपानवायु मुद्राकरे तो कुछ ही क्षणों में हृदय की ओर चढ़ता और दिल पर दबाव देता हुआ गैस का गुबार निकलजाएगाफलतः डॉक्टर के आने से पहले ही वह व्यक्ति मौत के चंगुल से बचजाएगा|........................................................................हर-हर महादेव

हस्त मुद्रा -सिद्धि और चिकित्सा एक साथ


हस्त मुद्रा से चिकित्सा भी और सिद्धि भी 
==========================
 मानव शरीरपृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश तथा वायुपंचतत्वसे निर्मित है और हाथों की पांचों उंगलियों में अलग अलग तत्व मौजूद है जैसे अंगूठे मेंअग्नि तत्वतर्जनी उंगली में वायु तत्व,मध्यमा उंगली में आकाश तत्व और अनामिकाउंगली में पृथ्वी और कनिष्का उंगली में जलतत्व मौजूद है। शरीर में जो ठोस है,वह पृथ्वीतत्व ,जो तरल या द्रव्य है वह जल तत्व,जोऊष्मा है वह अग्नि तत्व,जो प्रवाहित होता हैवह वायु तत्व और समस्त क्षिद्र आकाश तत्व है|
साधारणतया आहार विहार का असंतुलन इन पंचतत्वों के संतुलन को विखण्डित करता है औरफलस्वरूप मनुष्य शरीर भांति भांति के रोगों से ग्रसित हो जाता है | यूँ तो नियमित व्यायामतथा संतुलित आहार विहार सहज स्वाभाविक रूप से काया को निरोगी रखने में समर्थ हैं , परवर्तमान के द्रुतगामी व्यस्ततम समय में कुछ तो आलस्यवश और कुछ व्यस्तता वश नियमितयोग सबके द्वारा संभव नहीं हो पाता , परन्तु योग में कुछ ऐसे साधन हैं जिनमे  ही अधिकश्रम की आवश्यकता है और  ही अतिरिक्त समय कीइसे " मुद्रा चिकित्सा " कहते हैं |विभिन्न हस्तमुद्राओं से अनेक व्याधियों से मुक्ति संभव है |
        योग में आसन प्राणायाममुद्राबंध अनेक विभाग बनाए गए हैं। इसमे हस्त मुद्राओंका बहुत ही खास स्थान है। मुद्रा जितनी भी प्रकार की होती है उन्हे करने के लिए हाथों की सिर्फ10 ही उंगलियों का उपयोग होता है। उंगलियों से बनने वाली मुद्राओं में रोगों को दूर करने काराज छिपा हुआ है। हाथों की सारी उंगलियों में पांचों तत्व मौजूद होते हैं। मुद्रा और दूसरेयोगासनों के बारे में बताने वाला सबसे पुराना ग्रंथ घेरण्ड संहिता है। हठयोग के इस ग्रंथ कोमहर्षि घेरण्ड ने लिखा था। इस ग्रंथ में योग के देवता भोले शंकर ने माता पार्वती से कहा है कि हेदेवीमैने तुम्हे मुद्राओं के बारें में ज्ञान दिया है सिर्फ इतने से ही ज्ञान से सारी सिद्धियां प्राप्तहोती है।
          मुद्रा के द्वारा अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है। उंगलियों के पांचों वर्ग पंचतत्वोंके बारें में बताते हैं। जिससे अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिये मुद्रा विज्ञान में जबउंगलियों का रोगानुसार आपसी स्पर्श करते हैंतब विद्युत बहकर होकर शरीर में समाहितशक्ति जाग उठती है और हमारा शरीर निरोगी होने लगता है।
अँगुलियों को एक दुसरे से स्पर्श करते हुए स्थिति विशेष में इनकी जो आकृति बनती है,उसे मुद्राकहते हैं | मुद्रा के द्वारा अनेक रोगों को दूर किया जा सकता है। उंगलियों के पांचों वर्ग पंचतत्वोंके बारें में बताते हैं। जिससे अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिये मुद्रा विज्ञान में जबउंगलियों का रोगानुसार आपसी स्पर्श करते हैंतब विद्युत बहकर होकर शरीर में समाहितशक्ति जाग उठती है और हमारा शरीर निरोगी होने लगता है। मुद्रा चिकित्सा में विभिन्न मुद्राओंद्वारा असाध्यतम रोगों से भी मुक्ति संभव है |वस्तुतः भिन्न तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हाथकी इन अँगुलियों से विद्युत प्रवाह निकलते हैं और विद्युत प्रवाहों के परस्पर संपर्क से शरीर केचक्र तथा सुसुप्त शक्तियां जागृत हो शरीर के स्वाभाविक रोग प्रतिरोधक क्षमता कोआश्चर्यजनक रूप से उदीप्त तथा परिपुष्ट करती है | पंचतत्वों का संतुलन सहज स्वाभाविक रूपसे शरीर को रोगमुक्त करती है |रोगविशेष के लिए निर्देशित मुद्राओं को तबतक करते रहनाचाहिए जबतक कि उक्त रोग से मुक्ति  मिल जाए |रोगमुक्त होने पर उस मुद्रा का प्रयोग नहींकरना चाहिए | मुद्राओं से केवल काया ही निरोगी नहीं होतीबल्कि आत्मोत्थान भी होता है,क्योंकि मुद्राएँ शूक्ष्म शारीरिक स्तर पर कार्य करती है |कुछ मुद्राएँ कभी भी कही भी अथवा रोज की जा सकती या की जाती है |इनसे लाभ ही होता है |पूजा में भी मुद्रा प्रदर्शित की जाती है ,जिसका मूल कारण सम्बंधित शक्ति जिसकी पूजा की जा रही है उसकी उर्जा और संतुलन शरीर में नियमित किया जाए ,ताकि जब प्रकृति की सामान ऊर्जा प्राप्त हो तो आसानी से स्वीकार ह सके और शीघ्र तथा बिना बाधा के सिद्धि प्राप्त हो सके |
योग विज्ञान में मुद्राओं के द्वारा बहुत से लाभों के बारें मे बताया गया है जैसेशरीर से सारेरोग समाप्त हो जाते हैमन में अच्छे विचार पैदा होते है आदि। जो व्यक्ति अपने जीवन कोखुशहालनिरोग और स्वस्थ बनाना चाहता है उनको अपनी जरूरत के मुताबिक मुद्राओं काअभ्यास करना चाहिए। मुद्राओं को बच्चों से लेकर बूढ़े सभी कर सकते हैं। हस्त मुद्रा तुरंत हीअपना असर दिखाना चालू कर देती है। जिस हाथ से ये मुद्राएं बनाते हैशरीर के उल्टे हिस्से मेंउनका प्रभाव तुरंत ही नज़र आना शुरू हो जाता है। इन मुद्राओं को करते समय वज्रासन,पदमासन या सुखासन आदि का इस्तेमाल करना चाहिए। इन मुद्राओं को रोजाना 30 से 45मिनट तक करना लाभकारी होता है। इन मुद्राओं को अगर एक बार करने में परेशानी आए तो 2-3 बार में भी करके पूरा लाभ पाया जा सकता है। किसी भी मुद्रा को करते समय हाथ की जिसउंगली का मुद्रा बनाने में कोई उपयोग ना हो उसे बिल्कुल सीधा ही रखना चाहिए। एक बात काध्यान रखना जरूरी है कि जिस हाथ से मुद्रा की जाती है उसका प्रभाव उसके बाईं ओर के अंगोंपर पड़ता है।.....................................................हर-हर महादेव

मुद्राएँ और बंध :: जीवन बदल सकती हैं


मुद्राएँ और बंध :: जीवन बदल सकती हैं ,सब कुछ दे सकती हैं 
=========== ================================
घेरंड ने 25 मुद्राओं एवं बंध का उपदेश दिया है और भी अनेक मुद्राओं का उल्लेख अन्य ग्रंथों मेंमिलता है। मुद्राओं के अभ्यास से गंभीर से गंभीर रोग भी समाप्त हो सकता है। मुद्राओं से सभी तरहके रोग और शोक मिटकर जीवन में शांति मिलती है। हठयोग प्रदीपिका में 10 मुद्राओंका उल्लेखकर उनके अभ्यास पर जोर दिया गया है। ये हैंमहामुद्रा महा बन्धो महावेधश्च खेचरी। उड्यानंमूल बंधश्च बन्धो जालंधराभिश्च:।। करणी विपरीताख्‍या वज्रोली शक्तिशालनम। इंद हि मुद्रादशकंजराभरणनाशनम।।
 अर्थातमहामुद्रामहा बंध , महावेधश्चखेचरीउड्डीयान बंध , मूल बंध , जालंधर बंध , विपरीतकरणीवज्रोलीशक्तिचालनये दस मुद्राएं जराकरण को नष्ट करने वाली एवं दिव्य ऐश्वर्यों कोप्रदान करने वाली हैं। अर्थात 4 बंध और 6 मुद्राएं हुईंलेकिन इसके अलावा भी अन्यकई बंध और मुद्राओंका उल्लेख मिलता है।
 इसके अलावा अलग-अलग ग्रंथों के अनुसार अलग-अलग मुद्राएं और बंध होते हैं। योगमुद्रा को कुछयोगाचार्यों ने 'मुद्राके और कुछ ने 'आसनोंके समूह में रखा है। दो मुद्राओ को विशेष रूप सेकुंडलिनी जागरण में उपयोगी माना गया हैसांभवी मुद्राखेचरी मुद्रा।
 मुख्‍यत: 5 बंध : 1.मूल बंध , 2.उड्डीयान बंध , 3.जालंधर बंध , 4. बंधत्रय और 5.महा बंध
 मुख्‍यत: 6 आसन मुद्राएं हैं- 1.व्रक्त मुद्रा, 2.अश्विनी मुद्रा, 3.महामुद्रा, 4.योग मुद्रा, 5.विपरीतकरणी मुद्रा, 6.शोभवनी मुद्रा। जगतगुरु रामानंद स्वामी पंच मुद्राओं को भी राजयोग का साधनमानते हैंये है- 1.चाचरी, 2.खेचरी, 3.भोचरी, 4.अगोचरी, 5.उन्न्युनी मुद्रा।
 मुख्‍यतदस हस्त मुद्राएं : उक्त के अलावा हस्त मुद्राओं में प्रमुख दस मुद्राओं का महत्व है जोनिम्न है: -(1)ज्ञान मुद्रा, (2)पृथवि मुद्रा, (3)वरुण मुद्रा, (4)वायु मुद्रा, (5)शून्य मुद्रा, (6)सूर्य मुद्रा, (7) प्राण मुद्रा, (8)लिंग मुद्रा, (9) अपान मुद्रा, (10)अपान वायु मुद्रा।
 अन्य मुद्राएं : (1)सुरभी मुद्रा, (2)ब्रह्ममुद्रा, (3)अभयमुद्रा, (4)भूमि मुद्रा, (5)भूमि स्पर्शमुद्रा, (6)धर्मचक्रमुद्रा, (7)वज्रमुद्रा,(8)वितर्कमुद्रा,(8)जनाना मुद्रा, (10)कर्णमुद्रा, (11)शरणागतमुद्रा, (12)ध्यान मुद्रा, (13)सुची मुद्रा,(14)ओम मुद्रा, (15)जनाना और चीन मुद्रा, (16)अंगुलियां मुद्रा(17)महात्रिक मुद्रा, (18)कुबेर मुद्रा, (19)चीन मुद्रा, (20)वरद मुद्रा, (21)मकर मुद्रा, (22)शंख मुद्रा, (23)रुद्र मुद्रा,(24)पुष्पपूत मुद्रा (25)वज्र मुद्रा, (26)हास्य बुद्धा मुद्रा, (27) ज्ञान मुद्रा, (28)गणेशमुद्रा (29)मातंगी मुद्रा, (30)गरुड़ मुद्रा, (31)कुंडलिनी मुद्रा, (32)शिव लिंग मुद्रा, (33)ब्रह्मा मुद्रा, (34)मुकुल मुद्रा (35)महर्षि मुद्रा, (36)योनी मुद्रा, (37)पुशन मुद्रा, (38)कालेश्वर मुद्रा, (39)गूढ़मुद्रा, (40)बतख मुद्रा, (40)कमल मुद्रा, (41) योग मुद्रा, (42)विषहरण मुद्रा, (43)आकाश मुद्रा, (44)हृदय मुद्रा, (45)जाल मुद्रा, (46) पाचन मुद्राआदि।
 मुद्राओं के लाभ : कुंडलिनी या ऊर्जा स्रोत को जाग्रत करने के लिए मुद्रओं का अभ्यास सहायकसिद्धि होता है। कुछ मुद्रओं के अभ्यास से आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त की जा सकती है। इससेयोगानुसार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव है। यह संपूर्ण योग का सार स्वरूपहै।......................................................हर-हर महादेव

महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...