गुरुवार, 1 अगस्त 2019

महाकाली का षोडशोपचार पूजन


माता महाकाली और षोडशोपचार पूजन
=======================
महाकाली के सभी रूपों का पूजन सामान्य गृहस्थ अथवा सामान्य व्यक्ति के लिए समान होता है |साधकों के लिए विशिष्ट रूपों के अनुसार और विशिष्ट लक्ष्य के अनुसार पूजन भिन्न हो सकता है |चूंकि हम सामान्य लोगों के लिए लिख रहे हैं ,अतः सामान्य पूजन क्रम दिया जा रहा है |विशिष्ट पूजन गुरु गम्य होता है जो गुरु ही बताता है |महाकाली के अंतर्गत इनके विभिन्न रूप आते हैं ,जैसे दक्षिण काली ,भद्रकाली ,शमाशान्काली आदि ,,|जब जिस स्वरुप की पूजा की जाए तो उसमे निम्न दिए गए मंत्र में भद्रकाली के स्थान पर उस रूप का नाम जोड़ दिया जाता है |केवल महाकाली पूजन किया जाए तो भद्रकाली के स्थान पर महाकाली जोड़ दिया जाता है |अन्य अक्षर और बीज महाकाली के सभी रूपों हेतु सामान्य रूप से ग्राह्य हैं |इस पोस्ट में हम महाकाली पूजन हेतु भद्रकाली पूजन क्रम प्रस्तुत कर रहे ,जिसके आधार पर ही अन्य स्वरूपों का भी पूजन होता है ,,केवल ध्यान उस विशिष्ट स्वरुप का लग से जोड़ना होता है और मंत्र में उनका नाम |इस क्रम के आधार पर दैनिक पूजन की जा सकती है |
माता भद्रकाली ,आद्या शक्ति महाकाली की एक रूप हैं जिनकी आराधना /साधना गृहस्थ के लिए बहुत लाभदायक होती है |इनकी विशिष्ट पूजा /अनुष्ठान हेतु तो एक लम्बी पूजन-स्थापन-प्राण प्रतिष्ठा प्रक्रिया करनी होती है जो बिना योग्य जानकार के सामान्य साधकों अथवा गृहस्थों के लिए मुश्किल होती है ,किन्तु प्रतिदिन की विधिवत षोडशोपचार पूजन कैसे की जाए और क्या क्या उसके ang होते हैं यह निम्न क्रम से हो सकता है |इस पद्धति के आधार पर प्रतिदिन की पूजा साधक/आराधक कर सकते हैं |
ध्यान 
======
महामेघ प्रभां देवी कृष्णवस्त्रोसिधारिणीम् ।
ललज्जिह्वां घोरदंष्ट्रां कोटराक्षीं हसन्मुखीम् ॥
नागहारलतोपेतां चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां लेलिहानासवं पिबम् ॥
नाग यज्ञोपवीताङ्गी नागशय्या निषेदुषीम् ।
पञ्चाशन्मुण्डसंयुक्तं वनमाला महोदरीम् ॥
सहस्त्रफण संयुक्तमनन्तं शिरसोपरि ।
चतुर्दिक्षु नागफणा वेष्टितां भद्रकालिकाम् ॥
तक्षक सर्पराजेन वामकङ्कण भूषिताम् ।
अनन्त नागराजेन कृतदक्षिण कङ्कणम् ॥
नागेन रसनाहार कक्पितां रत्न नूपुराम् ।
वामे शिव स्वरूपं तत्कल्पितं वत्स्‌रूपकम् ॥
द्विभुजां चिन्तयेद्देत्नीं नागयज्ञोपवीतिनीम् ।
नरदेह समाबद्ध कुण्डल श्रुति मण्डिताम् ॥
प्रसन्नवदनां सौम्यां शिवमोहिनीम् ॥
अट्टहासां महाभीमां साधकाभीष्टदायिनीम् ॥
=========
पुष्प समर्पण :-
=========
ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते 
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव
========
नमस्कार 
========
शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे 
सर्व देवस्तुते ! भद्रकालिके ! त्वां नमाम्यहम
. आसन :- प्रथम दिन कि पूजा में माँ को काले रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो काले रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )
. पाद्य :- इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )
. उद्वर्तन :- इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )
. आचमन :- इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आचमनीयम् समर्पयामि )
. स्नान :- इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सदा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा स्नानं निवेदयामि )
. मधुपर्क :- इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्कं समर्पयामि )
विशेष :- ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें
. चन्दन :- इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चन्दनं समर्पयामि )
. रक्त चन्दन :- इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा रक्त चन्दनं समर्पयामि )
. सिन्दूर :- इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सिन्दूरं समर्पयामि )
१०. कुंकुम :- इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कुंकुमं समर्पयामि )
११. अक्षत :- अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो काले रंग में रंगे हुए हों
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा अक्षतं समर्पयामि )
१२. पुष्प :- माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि यदि आपको काला गुलाब मिल जाये तो बहुत बढ़िया यदि नहीं मिलता तो लाल गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पं समर्पयामि )
१३. विल्वपत्र :- माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा बिल्वपत्रं समर्पयामि )
१४. माला :- इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पमालां समर्पयामि )
१५. वस्त्र :- इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो - प्रथम दिन कि पूजा में काले वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )
. ( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )
. ( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )
१५. धूप :- इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा धूपं समर्पयामि )
१६. दीप :- इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दीपं दर्शयामि )
१७. इत्र :- इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )
१८. कर्पूर दीप :- इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कर्पूर दीपम दर्शयामि )
१९. नैवेद्य :- इस क्रिया में माता को फल - फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा नैवेद्यं समर्पयामि )
२०. खीर :- इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दुग्ध खीरम समर्पयामि )
२१. मोदक :- इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मोदकं समर्पयामि )
२२. फल :- इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ऋतुफलं समर्पयामि )
२३. जल :- इस क्रिया में खान - पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा जलम समर्पयामि )
२४. करोद्वर्तन जल :- इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )
२५. आचमन :- इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुनराचमनीयम् समर्पयामि )
२६. ताम्बूल :- इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ताम्बूलं समर्पयामि )
२७. काजल :- माता को काजल समर्पित करें
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कज्जलं समर्पयामि )
२८. महावर :- इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा महावरम समर्पयामि )
२९. चामर :- इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चामरं समर्पयामि )
३० . घंटा वाद्यम् :- इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा घंटा वाद्यं समर्पयामि )
३१. दक्षिणा :- इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है - ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )
( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )
३३. पुष्पांजलि :-
ॐ काली काली भद्रकाली कालिके पाप नाशिनी 
काली कराली निष्क्रान्ते भद्रकाल्यै तवननमोस्तुते 
ॐ उत्तिष्ठ देवी चामुण्डे शुभां पूजा प्रगृह्य में 
कुरुष्व मम कल्याणमस्टाभि शक्तिभिः सह 
भुत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि 
देवेभ्यो मानुषोभ्योश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा 
सर्वदेवमयीं देवीं सर्व रोगभयापहाम
ब्रह्मेश विष्णु नमिताम् प्रणमामि सदा उमां 
आय़ुर्ददातु में भद्रकाल्यै पुत्रानादि सदा शिवा 
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिं समर्पयामि
३४. नीराजन :- इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है
ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके
३५. क्षमा प्रार्थना :-
ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम 
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते 
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम् 
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी 
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः 
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः 
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान् 
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः
३६. आरती :- इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है |......................................................................हर-हर महादेव 

भगवती महाकाली के विविध स्वरुप


भगवती महाकाली के विविध स्वरुप
=====================
भगवती आद्या ,महाकाली ही इस सृष्टि की इस ब्रह्माण्ड की मूल शक्ति हैं ,जो सृष्टि के पूर्व भी हैं और सृष्टि के बाद भी हैं |यही ब्रह्माण्ड में अनंत व्याप्त मूल शक्ति हैं |यही हर क्रिया की कारण शक्ति हैं |यही सभी शक्तियों की मूल शक्ति हैं |इनके बिना परम शिव भी शव अर्थात निष्क्रिय हैं |इन्हें विभिन्न वैदिक अथवा तांत्रिक शास्त्रों में विभिन्न स्वरूपों में परिभाषित किया गया है |यही एकमात्र सर्वमान्य शक्ति हैं जो वैदिक से लेकर तांत्रिक तक सभी जगह एक सामान पूजित हैं और हर पद्धति से पूजित हैं |इनके स्वरूपों को इनके रूप भेद कहते हैं ,जो विशिष्ट गुणों को परिभाषित करते हैं |इनके स्वरूपों के साथ इनके चित्रों में भी विशिष्टता आ जाती है |काली के अलग-अलग तंत्रों में अनेक भेद हैं कुछ शास्त्रों के अनुसार इनके मूल आठ स्वरुप भेद इस प्रकार हैं -
१॰ संहार-काली, २॰ दक्षिण-काली, ३॰ भद्र-काली, ४॰ गुह्य-काली, ५॰ महा-काली, ६॰ वीर-काली, ७॰ उग्र-काली तथा ८॰ चण्ड-काली
कुछ शास्त्रों में मूल आठ स्वरुप भेद इस प्रकार हैं -
. सृष्टि काली २. स्थिति काली ३. संहार काली ४.अनाख्या काली ५.भाषा काली ६.गुह्य काली ७. कामकला काली ८. श्मशान काली
कुछ शास्त्रों के अनुसार भगवती काली के मूल कुल २४ स्वरुप हैं |सभी रूपों पर दृष्टिपात करने पर यह अधिक तर्क सांगत लगता है |
कालिका-पुराण’ में उल्लेख हैं कि आदि-सृष्टि में भगवती ने महिषासुर को उग्र-चण्डी” रुप से मारा एवं द्वितीयसृष्टि में उग्र-चण्डी’ ही महा-काली” अथवा महामाया कहलाई
योगनिद्रा महामाया जगद्धात्री जगन्मयी भुजैः षोडशभिर्युक्ताः इसी का नाम“भद्रकाली” भी है भगवती कात्यायनी दशभुजा’ वाली दुर्गा है, उसी को उग्र-काली” कहा है कालिकापुराणे कात्यायनीमुग्रकाली दुर्गामिति तु तांविदुः ।“संहार-काली” की चार भुजाएँ हैं यही धूम्र-लोचन’ का वध करने वाली हैं वीर-काली” अष्ट-भुजा हैं, इन्होंने ही चण्ड का विनाश किया भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं वमौ नमः” इसी वीर-काली’ विषय में दुर्गा-सप्तशती में कहा हैं चण्ड-काली” की बत्तीस भुजाएँ हैं एवं शुम्भ का वध किया था यथा चण्डकाली तु या प्रोक्ता द्वात्रिंशद् भुज शोभिता
समयाचार रहस्य में उपरोक्त स्वरुपों से सम्बन्धित अन्य स्वरुप भेदों का वर्णन किया है ।

संहार-काली १॰ प्रत्यंगिरा, २॰ भवानी, ३॰ वाग्वादिनी, ४॰ शिवा, ५॰ भेदों से युक्त भैरवी, ६॰ योगिनी, ७॰ शाकिनी, ८॰ चण्डिका, ९॰ रक्तचामुण्डा से सभी संहार-कालिका के भेद स्वरुप हैं संहार कालिका का महामंत्र १२५ वर्ण का मुण्ड-माला तंत्र’ में लिखा हैं, जो प्रबल-शत्रु-नाशक हैं

दक्षिण-कालिका -कराली, विकराली, उमा, मुञ्जुघोषा, चन्द्र-रेखा, चित्र-रेखा, त्रिजटा, द्विजा, एकजटा, नीलपताका, बत्तीस प्रकार की यक्षिणी, तारा और छिन्नमस्ता ये सभी दक्षिण कालिका के स्वरुप हैं

भद्र-काली - वारुणी, वामनी, राक्षसी, रावणी, आग्नेयी, महामारी, घुर्घुरी, सिंहवक्त्रा, भुजंगी, गारुडी, आसुरी-दुर्गा ये सभी भद्र-काली के विभिन्न रुप हैं

श्मशान-काली भेदों से युक्त मातंगी, सिद्धकाली, धूमावती, आर्द्रपटी चामुण्डा, नीला, नीलसरस्वती, घर्मटी, भर्कटी, उन्मुखी तथा हंसी ये सभी श्मशान-कालिका के भेद रुप हैं

महा-काली - महामाया, वैष्णवी, नारसिंही, वाराही, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, इत्यादि अष्ट-शक्तियाँ, भेदों से युक्त-धारा, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा इत्यादि सब नदियाँ महाकाली का स्वरुप हैं

उग्र-काली - शूलिनी, जय-दुर्गा, महिषमर्दिनी दुर्गा, शैल-पुत्री इत्यादि नव-दुर्गाएँ, भ्रामरी, शाकम्भरी, बंध-मोक्षणिका ये सब उग्रकाली के विभिन्न नाम रुप हैं

वीर-काली -श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, पद्मावती, अन्नपूर्णा, रक्त-दंतिका, बाला-त्रिपुर-सुंदरी, षोडशी की एवं काली की षोडश नित्यायें, कालरात्ति, वशीनी, बगलामुखी ये सभी  वीरकाली के नाम भेद रुप हैं ।...........................................................................हर-हर महादेव

महाकाली दीक्षा के आवश्यक तत्व


महाविद्या महाकाली दीक्षा
============     
            दीक्षा एक संस्कार है, जिसके माध्यम से कुसंस्कारों का क्षय होता है,| अज्ञान, पाप और दारिद्र्य का नाश होता है,| ज्ञान शक्ति व् सिद्धि प्राप्त होती है और मन में उमंग व् प्रसन्नता पाती है। दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है और जब उसके चित्त में शुद्धता जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन कर आश्चर्य चकित रह जाता है। जब कोई श्रद्धा भाव से दीक्षा प्राप्त करता है, तो गुरु को भी प्रसनता होती है, कि मैंने बीज को उपजाऊ भूमि में ही रोपा है। वास्तव में ही वे सौभाग्यशाली कहे जाते है, जिन्हें जीवन में योग्य गुरु द्वारा ऐसी दुर्लभ दीक्षाएं प्राप्त होती हैं, ऐसे साधकों से तो देवता भी इर्ष्या करते हैं।
           साधनाओं की बात आते ही दस महाविद्या का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रत्येक महाविद्या का अपने आप में अलग ही महत्त्व है। लाखों में कोई एक ही ऐसा होता है जिसे सदगुरू से महाविद्या दीक्षा प्राप्त हो पाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद सिद्धियों के द्वार एक के बाद एक कर साधक के लिए खुलते चले जाते है। प्रत्येक महाविद्या दीक्षा अपने आप में ही अद्वितीय है,| साधक अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से प्रेरित होकर या गुरुदेव से निर्देश प्राप्त कर इनमें से कोई भी दीक्षा प्राप्त कर सकते हैं। मात्र एक महाविद्या साधना सफल हो जाने पर ही साधक के लिए सिद्धियों का मार्ग खुल जाता है, और एक-एक करके सभी साधनों में सफल होता हुआ वह पूर्णता की ओर अग्रसर हो जाता है। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है, कि दीक्षा कोई जादू नहीं है, कोई मदारी का खेल नहीं है, कि बटन दबाया और उधर कठपुतली का नाच शुरू हो गया।
महाकाली महाविद्या दीक्षा
===================
          यह तीव्र प्रतिस्पर्धा का युग है। आप चाहे या चाहे विघटनकारी तत्व आपके जीवन की शांति, सौहार्द भंग करते ही रहते हैं। एक दृष्ट प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की अपेक्षा एक सरल और शांत प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए अपमान, तिरस्कार के द्वार खुले ही रहते हैं। आज ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है, जिसका कोई शत्रु हो और शत्रु का तात्पर्य मानव जीवन की शत्रुता से ही नहीं, वरन रोग, शोक, व्याधि, पीडा भी मनुष्य के शत्रु ही कहे जाते हैं, जिनसे व्यक्ति हर क्षण त्रस्त रहता है और उनसे छुटकारा पाने के लिए टोने टोटके आदि के चक्कर में फंसकर अपने समय और धन दोनों का ही व्यय करता है, परन्तु फिर भी शत्रुओं से छुटकारा नहीं मिल पाता।
           महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार कर अपने भक्तों को रक्षा कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने मेघदूत’ , ‘ऋतुसंहार’ जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की, इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।
          काली दीक्षा काली के उच्च कोटि के साधक द्वारा ही दी जा सकती है |हर कोई इस दीक्षा को नहीं दे सकता |वैसे भी महाविद्याओं में से किसी की भी दीक्षा केवल सम्बंधित महाविद्या की तंत्रोक्त साधना करने वाला साधक ही दे सकता है |अतः इस दीक्षा के पहले सुनिश्चित होना चाहिए की गुरु वास्तव में काली का सिद्ध साधक है |ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है की आजकल सोसल मीडिया आदि पर प्रचार करके दीक्षाएं रेवड़ियों की तरह बांटी जा रही हैं ,कैम्प लगाकर दीक्षा दिया जा रहा है ,सार्वजनिक मंचों से बोलकर दीक्षाएं दी जा रही हैं ,जो की पूर्णतया गलत है |ऐसे गुरु दीक्षा दे रहे हैं जो सम्बंधित महाविद्या की तो बात ही क्या किसी भी महाविद्या के साधक या सिद्ध नहीं है |वैदिक कर्मकांडी और प्रवचनकर्ता भी महाविद्या की दीक्षाएं दे रहे हैं |व्यवसायी तांत्रिक अथवा भौतिकता में लिप्त गुरु दीक्षा दे रहे हैं |जिससे अक्सर असफलता मिल रही है शिष्यों को और वे फिर किसी और का मुंह देखने को विवश हो रहे हैं अथवा उनका मोहभंग हो रहा है |इन गुरुओं को तंत्र की अथवा सम्बन्धित महाविद्या साधना की तकनिकी जानकारी नहीं होती ,मात्र मंत्र देकर पैसे -दक्षिणा -उपहार लेकर कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं |अक्सर अन्य लोगों से दीक्षा प्राप्त साधक हमने मार्गदर्शन के लिए सम्पर्क करते हैं जो की गलत है |यह उन्हें पहले ही सोचना चाहिए |अक्सर शाबर मंत्र साधक से दीक्षा प्राप्त साधक तंत्रोक्त मंत्र करना चाहते हैं जो की मुश्किल हो जाता है |काली दीक्षा प्राप्त साधक अगर श्रद्धा के साथ साधना करे तो उसके समान शक्तिशाली कोई नहीं |वह चारो पुरुषार्थों को प्राप्त कर सकता है |देवता उसके इच्छाओं को पूर्ण करने को बाध्य होते हैं |उसकी सर्वत्र विजय होती है और उसे कोई बाधा प्रभावित नहीं कर सकती |
          दस महाविद्या में काली प्रथम रूप है। माता का यह रूप साक्षात और जाग्रत है। काली के रूप में माता का किसी भी प्रकार से अपमान करना अर्थात खुद के जीवन को संकट में डालने के समान है। महा दैत्यों का वध करने के लिए माता ने ये रूप धरा था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता की वीरभाव में पूजा की जाती है। काली माता तत्काल प्रसन्न होने वाली और तत्काल ही रूठने वाली देवी है। अत: इनकी साधना या इनका भक्त बनने के पूर्व एकनिष्ठ और कर्मों से पवित्र होना जरूरी होता है। यह कज्जल पर्वत के समान शव पर आरूढ़ मुंडमाला धारण किए हुए एक हाथ में खड्ग दूसरे हाथ में त्रिशूल और तीसरे हाथ में कटे हुए सिर को लेकर भक्तों के समक्ष प्रकट होने वाली काली माता को नमस्कार। यह काली एक प्रबल शत्रुहन्ता महिषासुर मर्दिनी और रक्तबीज का वध करने वाली शिव प्रिया चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव-दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई थी। इनका क्रोध तभी शांत हुआ था जब शिव इनके चरणों में लेट गए थे।
           महाकाली दीक्षा में अत्यंत आवश्यक तत्व है गुरु का तकनिकी रूप से सक्षम होना और खुद की साधना में अत्यंत उच्च स्थान होना ,क्योंकि महाकाली ही वह शक्ति हैं जो कुंडलिनी जाग्रत कर सकती हैं साथ ही समस्त उग्र शक्तियाँ एक साथ प्रदान कर सकती हैं |इनकी साधना की तकनीकी गलती साधक का वर्त्तमान और भविष्य दोनों नष्ट कर देती है |श्रद्धा और भावना से की गयी आराधना एक अलग विषय है जहाँ यह माँ स्वरुप में हानि नहीं करती किन्तु साधना की स्थिति आते ही यह कोई गलती क्षमा नहीं करती |जो गुरु तकनीकी दक्ष होगा और अपनी साधना में रम कर उच्चावस्था प्राप्त कर रहा होगा वह सामान्यतया दीक्षा में रूचि नहीं लेगा क्योंकि उसे सदैव योग्य शिष्य ही चाहिए जो वास्तविक साधना का इच्छुक और भौतिकता से अलग मुक्ति की कामना रखता हो |ऐसा शिष्य मिलना मुश्किल है ,अतः गुरु बहुत कम लोगों को दीक्षा देता है वह भी कठिन परीक्षा लेकर |
             बाजार में तो लाखों गुरु भरे पड़े हैं किन्तु शिष्य का सौभाग्य होता है सच्चा गुरु पा लेना |सच्चा गुरु कभी पैसे नहीं मांगता और उसका कोई शुल्क नहीं होता किन्तु जब वास्तविक गुरु मिल जाए तो दीक्षा समय शिष्य को चाहिए की वह गुरु को उतना पूर्ण वस्त्र समर्पित करे जितना वह धारण करते हों |कम से २७ दिन के उनके भोजन योग्य सामग्री अथवा मूल्य और एक दिन के उनके परिवार के लिए भोजन सामग्री अथवा मूल्य समर्पित करे |दीक्षा समय थोड़े फल -फूल और दक्षिणा उनके चरणों में अर्पित करे |२७ दिन का तात्पर्य २७ नक्षत्र से है जिनमे शिष्य का भोजन करते हुए गुरु का आशीर्वाद प्राप्त हो |बहुत से शिष्य पूरे सौर वर्ष अर्थात १२ राशियों के भ्रमण काल के बराबर श्रद्धा अर्पित करते हैं जिससे गुरु का आशीर्वाद पूरे सूर्य के सभी ग्रह नक्षत्रों में भ्रमण करने तक मिल सके |कम से कम २७ नक्षत्र तो आवश्यक होता है |पहले के समय में शिष्य भिक्षा मांगकर लाकर गुरुकुल चलाते थे किन्तु आज भिक्षा का समय तो नहीं पर गुरु आज भी वैसा ही है |वास्तविक गुरु जब व्यावसायिक नहीं होता तो उसका जीवन यापन भी शिष्य की जिम्मेदारी होता है ,अतः दीक्षा पूरे सामर्थ्य से लेनी चाहिए |
           महाकाली की दीक्षा एकाएक नहीं हो सकती |पहले आपको जानना चाहिए की आपकी क्षमताएं क्या हैं ,उद्देश्य क्या है ,जरूरते क्या हैं और आपके संस्कार क्या हैं |महाकाली के अनेक रूप और अनेक मंत्र हैं |महाकाली की साधना मतलब तकनिकी तंत्र साधना |यहाँ हर कदम गुरु की जरूरत है और हर कदम पर ब्रह्मांडीय उर्जा संरचना के वैज्ञानिक तकनिकी सूत्रों का प्रयोग है |आपको महाकाली के अपने अनुकूल रूप को जानना समझना चाहिए |श्मशान काली की साधना घर में नहीं हो सकती ,कामकला काली की साधना सात्विक भाव से मुश्किल है और दक्षिण काली की साधना भावुकता -कोमलता से रोते हुए नहीं हो सकती |इन अंतरों को समझना आवश्यक है |काली की साधना में वीर भाव आवश्यक है अतः यह डरपोक ,कायर लोगों के लिए नहीं है |इनके हर स्वरुप के गुण भिन्न हैं और तदनुरूप मंत्र हैं |मूलाधार की अधिष्ठात्री यह हैं और इनकी सिद्धि से मूलाधार की शक्तियाँ जाग जाती हैं |इनका साक्षात्कार होने का मतलब स्वयमेव कुंडलिनी जागरण |इनकी दीक्षा सामान्यतया तांत्रिक पद्धतियों से ही होती हैं किन्तु यदि साधक अत्यधिक सात्विक भाव वाला है तो गुरु सात्विक पद्धति से भी दीक्षा दे सकता है |इनकी दीक्षा प्राप्ति के लिए शिष्य में प्रबल आत्मबल ,साहस ,आत्मविश्वास ,धैर्य तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण होना चाहिए |कोशिश यह होनी चाहिए की काली सिद्ध गुरु से दीक्षा प्राप्ति के बाद आप किसी भी अन्य गुरु से दीक्षा न लें और उन्ही को आध्यात्मिक भौतिक सभी गुरु बनाएं |यदि आपके पहले से गुरु हैं तो बिना गुरु की अनुमति के आप काली की किसी अन्य से दीक्षा न लें |इन स्थितियों में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है जो समस्याएं दे सकता है |
   काली के मुख्य शस्त्र त्रिशूल और विशेष तलवार हैं जिसे खड्ग कहा जाता है |दीक्षा हेतु अथवा साधना हेतु सर्वोत्तम दिन शुक्रवार ,शनिवार ,कृष्ण चतुर्दशी ,अमावस्या आदि होता है | कालिका पुराण ,महाकाल संहिता आदि ग्रंथों में इनका विशेष उल्लेख मिलता है |काली का मूल बीज क्रीं और क्लीं है जिनके साथ विभिन्न बीजों का संयोजन इनके ऊर्जा की भिन्न प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है |
इनका एक मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा है किन्तु इनके किसी भी मंत्र की साधना बिना गुरु के नहीं की जानी चाहिए |कालीका के प्रमुख तीन स्थान है:- कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मंदिर इसे भी शक्तिपीठ में शामिल किया गया है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मंदिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
 महाकाली शाबर मन्त्र
----------------------
निरंजन निराकार अवगत पुरुष तत सार, तत सार मध्ये ज्योत, ज्योत मध्ये परम ज्योत, परम ज्योत मध्ये उत्पन्न भई माता शम्भु शिवानी काली काली काली महाकाली, कृष्ण वर्णी, शव वाहनी, रुद्र की पोषणी, हाथ खप्पर खडग धारी, गले मुण्डमाला हंस मुखी जिह्वा ज्वाला दन्त काली मद्यमांस कारी श्मशान की राणी मांस खाये रक्त-पी-पीवे भस्मन्ति माई जहाँ पर पाई तहाँ लगाई सत की नाती धर्म की बेटी इन्द्र की साली काल की काली जोग की जोगीन, नागों की नागीन मन माने तो संग रमाई नहीं तो श्मशान फिरे अकेली चार वीर अष्ट भैरों, घोर काली अघोर काली अजर बजर अमर काली भख जून निर्भय काली बला भख, दुष्ट को भख, काल भख पापी पाखण्डी को भख जती सती को रख, काली तुम बाला ना वृद्धा, देव ना दानव, नर ना नारी देवीजी तुम तो हो परब्रह्मा काली
काली का मूल मंत्र है - ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।

महामृत्युंजय मंत्र जप में सावधानियां और बचाव


महामृत्युंजय मंत्र की सावधानियां   
================
सामान्य रूप से जब किसी को कोई संकट आता है ,कोई विपत्ति दिखती है ,कोई ख़तरा लगता है तो आजकल यह सामान्य धारणा बन गयी है की बस महामृत्युंजय मंत्र का जप करो या हनुमान चालीसा बजरंग बाण का पाठ करो और सब संकटों ,कष्टों ,विपत्तियों से मुक्ति मिल जायेगी |यह है भी बिलकुल सच |अक्सर कष्ट ,संकट ,विपत्ति ,ख़तरा में हनुमान चालीसा ,बजरंग बाण और महामृत्युंजय ही याद आते हैं |ज्योतिषियों ,पंडितों द्वारा सबसे अधिक बताया जाने वाला उपाय भी महामृत्युंजय ही है और सबसे अधिक लोग इसी का अनुष्ठान भी कराते हैं |जब अनुष्ठान कराते हैं तब तो यह पंडितों द्वारा किया जाता है और सामान्य सावधानियां आपको बता दी जाती हैं जबकि मुख्य सावधानियां खुद पंडित लोग रखते हैं अपने जीवन चर्या में किन्तु जब आप खुद महामृत्युंजय का जप कर रहे हों तब क्या -क्या और कितनी सावधानियां रखनी चाहिए यह अक्सर लोग ध्यान नहीं रखते और हलके में लेकर जप करते हैं जिससे या तो पूरा परिणाम नहीं मिलता या अपरोक्ष रूप से क्षति होती है जिसे भाग्य का दोष मानकर भुगत लेते हैं |
            हनुमान चालीसा ,बजरंग बाण ,हनुमान मंत्र ,बगलामुखी मंत्र ,गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय जैसे पाठ और जप बहुत अधिक पवित्रता और नियमों के पालन की मांग करते हैं |आप यदि बिना नियम के और दैनिक जीवन जीते हुए इनका पाठ और जप कर रहे हैं तो आप बहुत बड़े रिष्क पर हो जाते हैं,बड़ा खतरा उठाते हैं आप |मृत्युंजय शिव ,सामान्य शिव नहीं हैं |जो आपका जीवन मृत्यु से बचा सकता है अगर वह या उसकी ऊर्जा विपरीत हो जाय या उसमे विक्षेप आ जाय तो आपके लिए यह बड़ा खतरा भी बन जाता है |इसे आप मजाक न समझे और आजकल के झोला छाप पंडितों ,ज्योतिषियों के कहने पर बिना नियम और सावधानी के इसे जपने न लगें |इतना ही आसान होते यह प्राण रक्षक उपाय तो कोई भी अकाल मौत न मरता ,सभी अपनी आयु पूर्ण कर लेते |जब भी कोई मंत्र जप किया जा रहा है तो आप मान लीजिये की यह तकनिकी क्रिया है ब्रह्मांडीय ऊर्जा सूत्रों के अनुसार |मंत्र नाद और भाव से जुड़े होते हैं जिनसे एक विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है और यह शरीर से उत्पन्न ऊर्जा ब्रह्मांड में उपस्थित समान ऊर्जा को आकर्षित कर मन की भावनाओं तथा संकल्प के अनुसार जुडकर लाभ देती है |यहाँ मात्र भावना का कोई महत्त्व नहीं होता और यहाँ मुंह से क्षमा मांगने का भी कोई अर्थ नहीं बनता |आ रही ऊर्जा या उत्पन्न हो रही शक्ति में विक्षेप हुआ अथवा शरीर ,भाव ,वातावरण अनुकूल न हुआ तो विकृति होती है जिससे क्षति भी सम्भव होती है |इनका सीधा प्रभाव मष्तिष्क और शारीरिक कार्यप्रणाली पर पड़ता है अतः इनमे गलतियाँ नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहाँ क्षमा करने को कोई मनुष्य नहीं होता |
                हमें इन मन्त्रों  के अनुभव रहे हैं और हमने दूसरों के लिए भी और स्वयं के लिए भी इनके जप किये हैं तथा इनके परिणामों का अनुभव किया है |यदि यह सावधानी और नियम से किये जाय तो किसी की जान बचा भी सकते हैं और त्रुटी हो जाय तो उसकी भी जान ले सकते हैं जिसके लिए किया जा रहा और खुद के लिए भी ख़तरा उत्पन्न करते हैं |अतः इन्हें हलके में न लें और जब तक नियम और सावधानी न पता हो इन्हें न जपें |कम से कम कोई नई दिक्कत तो नहीं उत्पन्न होगी |हमारा अनुभव यह रहा है की जिसके लिए महामृत्युंजय का पाठ किया जा रहा उसके माता -पिता ,भाई -बहन और पत्नी -पुत्र -पुत्री तक से नियमों की अनदेखी होने पर दुस्परिणाम सामने आते हैं |इसमें जिसके लिए जप किया जा रहा उसे तो खतरा बढ़ता ही है जप करने वाले पंडितों अथवा मुख्य पंडित की भी हानि की सम्भावना होती है |इस स्थिति में जबकि परिवार के लोगों की गलती से दुष्परिणाम मिलते हैं तो जो जप कर रहा उससे गलतियाँ हों तो कितने बड़े खतरे उत्पन्न हो सकते हैं अनुमान लगा सकते हैं | हम जब किसी के लिए मात्र महामृत्युंजय कवच भी बनाते हैं तो हमें सभी नियमों का उतने दिनों तक पालन करना होता है जब तक वह अभिमंत्रित होता है |ऐसा नहीं होता की मात्र भोजपत्र पर रेखाएं खिची और यन्त्र /कवच तैयार |यहाँ तक सभी नियमों का पालन करना होता है |
                  हम आपको सामान्य सावधानियां और नियम बता रहे हैं जिनका पालन आपको हनुमान ,बगलामुखी के पाठों और महामृत्युंजय आदि में अवश्य करनी चाहिये |बिना इन नियमों को जाने -समझे आपको यह पाठ नहीं करने चाहिए |सबसे प्रथम शर्त तो आप सभी जानते हैं और अधिकतर लोग पालन करने की भी कोशिश करते हैं ,वह है ब्रह्मचर्य का पालन |यह शर्त इसलिए रखी जाती है क्योंकि इससे दो लाभ तुरंत होते हैं |पहला की दो तीन दिन ब्रह्मचर्य का पालन करने पर मन भोग की ओर से कम होने लगता है और उसकी बार बार भोग की ओर भागने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है ,दूसरा लाभ यह होता है की ऊर्जा शरीर की इकठ्ठा होकर संघनित होने लगती है जिससे शरीर को तो बल मिलता ही है सम्बन्धित चक्र पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है जिससे सूक्ष्म शरीर को बल मिलता है |यही कारण है की कोई भी जप ,अनुष्ठान हो सबसे पहले ब्रह्मचर्य के पालन का नियम होता है |महामृत्युंजय के विशेष अनुष्ठान में जबकि प्राण बचाने के लिए यह किया जा रहा हो ,पंडितों के साथ मूल  व्यक्ति और नजदीकी सम्बन्धित व्यक्तियों तक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ,क्योंकि ब्रह्मचर्य का दुआ ,आशीर्वाद और आध्यात्मिक कामना से गहरा सम्बन्ध होता है |
           अब एक नियम का पालन आपको और करना चाहिए जबकि आप व्यक्तिगत रूप से जप कर रहे हों अपने लिए या किसी अन्य के लिए |अनुष्ठान में तो पंडित लोग संकल्प कराते हैं और खुद भी लेते हैं किन्तु घर में खुद जप करते समय अक्सर आप संकल्प नहीं लेते ,इससे आपका जप लक्ष्यहीन हो जाता है ,आपने तीर तो चलाया पर दिशा नहीं दी जिससे लक्ष्य पूर्णता में कमी आती है अतः संकल्प मंत्र संख्या और दिनों की लेने के साथ ही अपनी मनोकामना व्यक्त करना आवश्यक हो जाता है |यदि आपको संस्कृत में संकल्प लेना नहीं आता तो आप शुद्ध हिंदी में अपना नाम ,पिता नाम ,गोत्र आदि के साथ ,दिन ,तिथि व्यक्त करते हुए निश्चित दिनों तक निश्चित संख्या का जप विशेष उद्देश्य जो भी हो व्यक्त करते हुए संकल्प लें |संकल्प के समय हाथ में जल ,अक्षत ,पुष्प और द्रव्य रखें |जप के अवधि में आपका ध्यान उस व्यक्ति की स्वस्थता की कामना की ओर होना चाहिये जिसके लिए जप किया जा रहा |आपका ध्यान भटककर पारिवारिक अथवा अन्य प्रपंचों की ओर नहीं होना चाहिए इससे भी पूर्ण फल नहीं मिलता है |
           महामृत्युंजय अथवा हनुमान की उपासना में सबसे आवश्यक तत्व खान पान अर्थात आहार विहार के नियंत्रण का होता है |इनमे किसी भी स्थिति में मांस -मदिरा -अंडा ,लहसुन -प्याज का परित्याग होना चाहिए |महामृत्युजय में तो साबुन ,शैम्पू ,सरसों तेल ,बाजारू बने हुए भोज्य पदार्थ ,किसी भी दुसरे के घर के बने भोज्य पदार्थ ,खाट शयन तक का परित्याग करना चाहिए |इस अवधि में जब तक की रोज का महामृत्युंजय जप पूर्ण न हो जाय अन्न न खाया जाय अपितु फलाहार पर रहा जाय ,रात्री में अथवा जप पूर्णता पर लहसुन -प्याज -सरसों तेल के उपयोग बिना बना हुआ भोज्य ही ग्रहण किया जाय |महामृत्युंजय में यह सावधानी भी होनी चाहिए की रक्त सम्बन्धी जो लोग अति नजदीकी हों वह भी मांस -मदिरा -अंडे आदि का परित्याग करें जैसे भाई -बहन ,पति -पत्नी ,माता -पिता ,पुत्र -पुत्री आदि |अप जप अवधि में ध्यान दें की आप अशुद्ध स्थान पर न बैठें ,न लेटें |आप ऐसे अस्पताल आदि जाने से बचें जहाँ मृत्यु होती हो |मात्र स्वयं का स्वस्थ्य खराब होने पर ही जाएँ और घर आकर शुद्ध होकर ही दैनिक कार्य करें |आप ऐसी जगहों या रिश्तेदारियों में जाने से बचें जहाँ किसी की मृत्यु हुई हो अथवा किसी का जन्म हुआ हो १२ दिन के अन्दर |अगर जाना आवश्यक हो तो वहां कुछ भी खाएं पियें नहीं ,न ही मृतक और सम्बन्धित लोगों अथवा जन्मस्थ शिशु - उसकी माता को छुएं |इन सब बातों का महामृत्युंजय ,बगलामुखी आदि की साधनाओं में बचाव आवश्यक होता है |
          प्रतिदिन जप समाप्ति और अतिम दिन जप समाप्ति पर जप का समर्पण करते हुए अपनी कामना व्यक्त करें |आप जप के समय तो स्वच्छ रहते ही हैं आपको दिन में भी अधिकतम स्वच्छता और पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि कोई भी ऊर्जा आपसे मात्र जप के समय नहीं जुडती वह आपसे जब जुडती है तो पूरे समय के लिए जुडती है अतः उस ऊर्जा के अनुकूल आपका आचरण होना चाहिए |आप इन उपासनाओं के समय या जपों के समय गाली -गलौच ,असत्य भाषण ,मिथ्या भाषण ,अनर्गल प्रलाप ,दुष्ट संगत , किसी को कष्ट देने का कार्य ,रिश्वतखोरी ,किसी का अहित नहीं कर सकते |यदि इन सामान्य सावधानियों और नियमों का पालन आप अपने हनुमान उपासना अथवा महामृत्युंजय जप में करते हैं तो आपके लाभ की भी सम्भावना बढ़ जाती है और किसी क्षति की भी सम्भावना कम हो जाती है |नियम तो बहुत से हैं किन्तु इतनी सावधानियां अति आवश्यक हैं इन साधनाओं में और उपासनाओं में अतः ध्यान रखें सुखी रहें |धन्यवाद .............................................हर हर महादेव

महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...