मंगलवार, 11 जून 2019

सम्भोग से समाधि -कैसे सम्भव हो सकता है ?


सम्भोग से समाधि - कैसे सम्भव होता है ?
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भारतीय कुंडलिनी साधना के दो मार्गों में से एक मार्ग तंत्र का और दूसरा योग का रहा है |योग शरीर को अनुकूल बना कुंडलिनी जागरण करता है जिसमे नियम -संयम -आहार -प्राणायाम और ध्यान मुख्य तत्व होते हैं तो तंत्र में शरीर की ऊर्जा ,भाव और कठोर नियंत्रण मुख्य तत्व हैं |योग सम्भोग से विरक्ति पर कुंडलिनी जागरण की बात करता है तो तंत्र सम्भोग से ही कुंडलिनी जागरण की बात करता है |सम्भोग से समाधि तो बहुत छोटी अवस्था है ,तंत्र तो सम्भोग से कुंडलिनी जागरण कर मोक्ष की बात करता है |सम्भोग से समाधि ,नाम का प्रचलन इसलिए अधिक हुआ की ओशो ने इस नाम से एक पुस्तक लिख दी |ओशो ने भी भारतीय तंत्र सूत्रों पर ही यह पुस्तक लिखी किन्तु तंत्र सूत्र इससे भी कई कदम आगे मोक्ष और शिव -शक्ति के सायुज्य की बात करते हैं |सम्भोग से समाधि ही नहीं शिव -शक्ति सायुज्य और मोक्ष भी मिलता है यह वास्तविक तथ्य है भले इसे न जानने वाले , न समझने वाले इसकी कितनी भी आलोचना करें |यह विज्ञान भी उन्ही सूत्रों पर आधारित है जो विज्ञान ब्रह्मचर्य से ऊर्जा संरक्षण कर इश्वर प्राप्ति की बात करता है |भोग से मोक्ष प्राप्ति का तंत्र मार्ग हजारों -हजार वर्ष पुराना है जिसे अब कौल मार्ग कहा जाता है तथा इसके अब कई प्रकार विकसित हो चुके हैं |भारतीय तंत्र से ही यह ज्ञान बौद्ध में और क्रमशः पूरी दुनियां में फैला |भारत में यह गोपनीय साधना रहा और सामान्य सामाजिक संस्कार में इसे बताये जाने से परहेज रहा क्योंकि ऋषियों का मानना था की इससे सामाजिक उश्रीन्खलता बढ़ सकती है |यह गृहस्थ ऋषियों का गृहस्थ रहते हुए कुंडलिनी साधना का मार्ग रहा है जिससे वह आध्यात्मिक उन्नति भी करते रहें और गृहस्थ धर्म का भी पालन करते हुए सामाजिक विकास भी करते रहें |यह साधना मार्ग पूर्णतया वैज्ञानिक सूत्रों के अनुसार ही चलता है जिसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा विगान कहते हैं ,भले आज का विज्ञानं वहां पहुंचा हो या नहीं |
तंत्र के एक मुख्य मार्ग कुंडलिनी जागरण में सम्भोग से समाधि की बात कही गयी है ,यद्यपि अन्य रास्ते भी होते हैं ,किन्तु इस मार्ग की विशेषता यह है की यह वही कार्य कुछ ही समय में संपन्न कर सकता है जिसे अन्य मार्ग वषों में शायद कर पायें |इसकी पद्धति पूर्ण वैज्ञानिक है और शारीरिक ऊर्जा को इसका माध्यम बनाया जाता है |धनात्मक और ऋणात्मक की आपसी शार्ट सर्किट से उत्पन्न अत्यंत तीब्र ऊर्जा को पतित होने से रोककर उसे उर्ध्वमुखी करके इस लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है ,यद्यपि यह अत्यंत कठिन और खतरनाक मार्ग भी है जिसमे ऊर्जा सँभालने पर पूरी सर्किट के ही भ्रष्ट होने का खतरा होता है ,पर यह मार्ग वह उपलब्धियां कुछ ही समय में दे सकता है ,जिसे पाने में अन्य मार्गों से वर्षों समय लगता है और निश्चितता भी नहीं होती की मिलेगा ही |यह मार्ग यद्यपि अत्यंत विवादास्पद रहा है किन्तु इसकी वैज्ञानिकता संदेह से परे है और सिद्धांत पूरी तरह प्रकृति के नियमो के अनुकूल है |तभी तो प्रकृति पर नियंत्रण का यह सबसे उत्कृष्ट माध्यम है ,और किसी किसी रूप में अन्य माध्यमो में भी अपनाया जाता है |सामान्य पूजा-अनुष्ठानो में भी ब्रह्मचर्य के पालन की हिदायत दी जाती है ,उसका भी वही उद्देश्य होता है की ऊर्जा संरक्षित करके उसे उर्ध्वमुखी किया जाए |तंत्र में अंतर बस इतना ही आता है की इस ऊर्जा को तीब्र से तीब्रतर करके रोका और उर्ध्वमुखी किया जाता है ,इस हेतु प्रकृति की ऋणात्मक शक्ति को सहायक बनाया जाता है तीब्र ऊर्जा उत्पादन में |
सम्भोग और समाधि एक ही ऊर्जा के भिन्न तल हैं|. निम्न तल यानी मूलाधार चक्र पर जब जीवन ऊर्जा की अभिव्यक्ति होती है तो यह सेक्स बन जाता है ,सम्भोग बन जाता है |. उच्च तल पर समान उर्जा भगवत्ता बन जाती है जिसे समाधि कहा गया है|.यौन ऊर्जा का अर्थ वीर्य से नही है.| वीर्य मात्र यौन ऊर्जा का भौतिक तल है.| यौन ऊर्जा का वाहक है वीर्य.| यौन ऊर्जा ऊपर गति करती है| इसका यह अर्थ नही है वीर्य ऊपर चढ़ जाता है|. वीर्य के ऊपर चढने का कोई उपाय नही है|. यह मनस ऊर्जा है ,ओज है और अदृश्य है|. इसका केवल अनुभव होता है. जैसे हवा अदृश्य है और उसका केवल अनुभव होता है.| हमारी रीढ़ की हड्डी में सूक्ष्म नाड़िया हैं - इडा- पिंगला- सुषुम्ना. यह मनस उर्जा सुषुम्ना के द्वारा ऊपर का अभियान करती है. इसका सामना सात स्टेशनों से पड़ता है जिसे चक्र कहते हैं. और इस पूरी ऊर्जा की यात्रा को 'कुण्डलिनी जागरण' कहते हैं.|ध्यान और तंत्र की विधियों द्वारा इस ऊर्जा को ऊपर ले जाया जा सकता है.| यह विधिया आज से हजारों वर्ष पूर्व विश्व के प्रथम गुरु और मूल शक्ति भगवान शिव ने पार्वती को कहीं थी जिसे तन्त्र' में संस्कृत में संकलित किया गया है |एक ही भौतिक शरीर के प्रत्येक चक्र से एक अलग आध्यात्मिक शरीर जुडा हुआ है. और हर दूसरा शरीर विपरीत है. अर्थात पुरुष का दुसरा शरीर स्त्री का है और स्त्री का दुसरा शरीर पुरुष का. इसी लिए स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक धैर्यवान होती हैं क्यूँ की उनका दूसरा शरीर पुरुष का है जो अपेक्षाकृत मजबूत है.| अर्धनारीश्वर की प्रतिमा यही सन्देश देती है|
.इस प्रकार प्रत्येक शरीर में चक्रों से जुड़े शरीर होते हैं. एक -एक चक्र के जागरण के साथ एक एक शरीर सक्रीय होने लगता है. |शरीर परस्पर मिल जाते हैं. कुंडलीनी जागरण की यह प्रक्रिया ' अंतर सम्भोग' कही जाती है क्यूँ की एक स्त्री शरीर अपने ही पुरुष शरीर से संयुक्त हो जाती है, इसमें ऊर्जा नष्ट नही होती बल्कि ऊर्जा का एक अनन्य वर्तुल बन जाता है जो आध्यात्मिक जागरण और आंतरिक आनंद के रूप में परिलक्षित होता है. संतो के चेहरे पर खुमारी, तेज, दिव्यता का यही कारण है.| इस अंतर सम्भोग के अनेक दिव्य परिणाम होते हैं| बाहर के सेक्स से अनंत गुना आनंद और तृप्ति उपलब्ध होती है.| प्रत्येक चक्र के जागरण और शरीरो के मिलन से आनंद का खजाना मिलने लगता है|. बाहर सेक्स की इच्छा समाप्त हो जाती है. इसी को ब्रह्मचर्य कहते हैं.| व्यक्ति ब्रह्म जैसा हो जाता है. |उसकी चर्या ब्रह्म जैसी हो जाती है. शिव लिंग का प्रतीक इसी अंतर सम्भोग को परिलक्षित करता है.| चक्रों के जगने के साथ उसके सम्बंधित सिद्धियाँ मिल जाती हैं- जैसे ह्रदय चक्र के जगने के साथ विराट करुना प्रेम के आनंद का भान होने लगता है|. आज्ञा चक्र के जगने के साथ व्यक्ति तीनो कालो को जानने वाला हो जाता है.| विशुद्ध चक्र के जागने के साथ व्यक्ति जो बोले वह सत्य होने लगता है.| प्राचीन आशीर्वाद की कथाये उन्ही ऋषियों की क्षमताये हैं जिनका विशुद्ध चक्र सक्रीय हो गया था.| सहस्रार चक्र आखिरी चक्र है जिसके सक्रीय होते ही व्यक्ति परम धन्यता को उपलब्ध हो जाता है| जब वह ब्रह्म ही हो जाता है- 'अहम् ब्रह्मास्मि' का उद्घोष| . उसके शक्ति के अंतर्गत समस्त सृष्टि की शक्तियां उसके पास जाती हैं लेकिन वह इनका उपयोग नही करता क्यूँ की उसे यह भी बोध हो जाता है की सृष्टि इसके नियम उसी के द्वारा बनाये गये हैं.| परम ज्ञान की अवस्था को समाधि कहा गया है|. समाधि का अर्थ है समाधान.| इसकी अनुभूति चौथे शरीर से ही होने लगती है. चौथे शरीर से ही परमात्मा का ओमकार स्वरूप पकड़ में आने लगता है.|
अब हम आपको बताते हैं की वास्तव में सम्भोग से चक्र जागरण कैसे होता है और समाधि की अवस्था कैसे आती है ,कैसे व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है |कुछ सुनने वाले बिना समझे ,बिना जाने कमेन्ट में लिखेंगे की यह सम्भव ही नहीं है ,यह गलत है ,यह भोग मात्र है ,छद्म संस्कारियों को बात तक गलत लगेगी ,किन्तु यह सत्य है की ऐसा होता है और यह पूरी तरह सम्भव है |हम सामान्य सम्भोग की बात नहीं कर रहे ,हम लक्ष्य विशेष की ओर केन्द्रित सम्भोग की बात कर रहे और सम्भोग का अर्थ होता है सम अर्थात बराबर भोग का अर्थ है लिप्तता |जहाँ दो लोग बराबर संलिप्त हो भावावेग के साथ सम्बद्ध हो वही सम्भोग है |बिना भावना जुड़े सम्भोग सम्भव नहीं और तब वह मात्र भोग होता है |तंत्र में शरीर के सम्पर्क से अधिक मन और भावना का सम्पर्क महत्व रखता है ,यहाँ मनुष्य रति कम ब्रह्म रति और आत्मिक रति महत्व रखती है |सामान्य सम्भोग से भी अत्यधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है किन्तु जब आत्मिक या ब्रह्म रति की स्थिति में युगल आते हैं तो ऊर्जा की मात्रा इतनी अधिक बढती है की शरीर कम्पायमान होने लगता है और सुध बुध खोने लगता है |
जब एक युगल संभोगरत होते हुए भी पतित नहीं होता तो उसकी ऊर्जा ओज में बदलकर उर्ध्वमुखी होने लगती है |यहाँ वीर्य अथवा राज उर्ध्वमुखी नहीं होते ,इनके तो उपर जाने का मार्ग ही नहीं है |संभोगरत अवस्था में वीर्य और रज का उत्पादन होता है सामान्य अवस्था से कई गुना अधिक किन्तु इस उत्पादित वीर्य -रज को पतित नहीं होने दिया जाता |एक निश्चित अवस्था पर सम्भोग रोककर इन्हें पतन तक आने नहीं दिया जाता |रोकने की निश्चित अवस्था का ज्ञान और आवश्यक तकनीकियाँ गुरु बताता है |यदि गलत स्थान पर गलत समय इन्हें रोका जाय तो यह गंभीर रोग अथवा शारीरिक समस्या उत्पन्न कर सकते हैं किन्तु तंत्र साधक ६ महीने तक भी साधना करते हुए भी रोकते हैं और उनमे कोई विकृति नहीं आती ,उनकी सामर्थ्य और क्षमता बढ़ जाती है |यह सब तकनीक पर आधारित होता है जो मात्र गुरु बताता है |हम यहाँ तकनीक पर कोई चर्चा नहीं कर सकते क्योंकि यह गोपनीय होते हैं और बताना तंत्र नियमो का उल्लंघन होता है |हम मात्र यह बता रहे की कैसे सम्भोग से समाधि और मोक्ष सम्भव है |२ मिनट में पतित होने वाले शायद दो घंटे का बिना पतन का सम्भोग न समझ पायें ,सम्भोग को मात्र भोग समझने वाले शायद इसकी शक्ति को न समझ पायें किन्तु यह वह शक्ति है जो व्यक्ति को श्रृष्टि की उसकी ही क्षमता से उसे श्रृष्टिकर्ता तक से मिला सकती है |
संभोगरत युगल जब पतित होने से खुद रोकते हुए साधनारत रहता है तो ऊर्जा तो पतित नहीं होती किन्तु ऊर्जा उत्पादन होते रहने से ऊर्जा बढती और संघनित होती जाती है ,यह ऊर्जा तीव्र क्रिया के साथ एकत्र हो ओज में बदलती है और भौतिक अस्तित्व से उपर उठते हुए सूक्ष्म शरीर के चक्र मूलाधार को और उद्वेलित करती जाती है जिससे वहां तरंगो का उत्पादन बढ़ता जाता है ,वहां की शक्तियाँ क्रियाशील होने लगती हैं |कुछ समय बाद यह उद्वेलन इतना बढ़ता है की मूलाधार में सुप्त पड़ी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है ,समय क्रम में ऊर्जा प्रवाह बढने पर कुंडलिनी जागकर तीव्रता से क्रिया करती है और उपर की ओर उठती है |यहाँ मूलाधार का जागरण होता है और सभी सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होने से यहाँ से सिद्धियों का क्रम शुरू होता है |जब ऊर्जा उत्पादन सतत बना रहता है और साधक युगल नियंत्रित हो साधनारत रहते हैं तो कुंडलिनी स्वाधिष्ठान और क्रमशः अन्य चक्रों का जागरण करते हुए सहस्त्रार तक पहुँचती है और यहाँ शिव -शक्ति सायुज्य होता है |समाधि की अवस्था तो बीच में ही आ जाती है ,सहस्त्रार से निर्बिक्ल्प समाधि और ब्रह्माण्ड यात्रा शुरू हो जाती है अंततः व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है |समाधि तो मुक्ति अवस्था पाते ही लग जाती है और मुक्ति तथा मोक्ष में बड़ा अंतर है |यह सब सुनने में तो आसान लग रहा किन्तु यह दुनियां का सबसे कठिन काम है क्योंकि मनुष्य की प्रकृति ही पतित होने की होती है और वह पूरा जीवन अपनी ऊर्जा फेंकता ही रहता है |खुद की प्रवृत्ति बदल ऊर्जा संरक्षित कर उर्ध्वमुखी करना संसार का सबसे कठिन काम है ,वह भी तब जब की वह ऊर्जा सामान्य से लाखों गुना बढ़ जाए रोकते हुए |इसी कारण से तंत्र से कुंडलिनी साधना सबसे कठिन है क्योंकि यह उस शक्ति को उपर उठाता है जो हमेशा नीचे की ओर ही जाना चाहती है |
यह सब तकनिकी और गुरु गम्य मार्ग है जहाँ बिना गुरु के एक कदम नहीं चला जा सकता |ऊर्जा न सम्भली तो भी पतन है और तकनीकी गलती हुई तो भी पतन है |हमारा उद्देश्य मात्र इतना है यहाँ बताने का की वास्तव में कैसे सम्भोग से समाधि और मोक्ष या मुक्ति की स्थिति आती है |हम चक्रीय विस्तार में नहीं गए हैं क्योंकि विषय इतना बड़ा है की कई पुस्तक कम पड़ जायेंगे |सम्भोग से समाधि सम्भव है और यह पद्धति हमेशा से भारतीय तंत्र की अमूल्य धरोहर रहा है जिसके द्वारा गृहस्थ भी कुंडलिनी साधना करते हुए वह सभी लक्ष्य पा सकते हैं जो एक योगी और सन्यासी पाता है |चूंकि यह मार्ग भोग में रहते हुए भोग द्वारा हो मोक्ष देने का मार्ग है अतः कठिन भी कई गुना अधिक है और खतरे भी अधिक होते हैं |धन्यवाद ..........................................................................हर-हर महादेव 

  

रविवार, 2 जून 2019

कौन हैं आपके कुलदेवी /देवता ?क्या पूजा पद्धति है आपके कुलदेवता /देवी की ?


कैसे जाने अपने कुलदेवता को ?कैसे उनकी पूजा पद्धति बने ?
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कुलदेवता और कुलदेवी पर हमने बीसियों वर्षों से ध्यान दिया है ,अध्ययन किया है ,समझा है और पाया है की लोगों की अधिकतर समस्याओं के पीछे कहीं न कहीं कुलदेवी या देवता की भूमिका होती है ,यद्यपि यह स्वयं कोई समस्या नहीं उत्पन्न करते किन्तु इनकी निर्लिप्तता से ,इनके रुष्ट होने से या कमजोर होने से पित्र दोष और बाहरी बाधाएं ऐसी ऐसी समस्या उत्पन्न करते हैं की व्यक्ति अनेकानेक उलझनों ,दिक्कतों में घिरता जाता है |हमने कुलदेवता और देवी से सम्बन्धित लगभग दो दर्जन पोस्ट लिखे हैं जिन्हें हमने अपने ब्लॉग और फेसबुक पेजों पर कई वर्ष पहले से प्रकाशित कर रखा है |हमारे पेजों और ब्लॉग से हमारे पोस्टों को कापी करते हुए अनेक लोगों ने उस पर विडिओ बना यू ट्यूब पर डाला है किन्तु उन्होंने कुलदेवता या कुलदेवी के नाम वाले ही पोस्ट उठाये हैं ,अन्य तकनीकियों ,पूजा पद्धति ,सूत्र और सिद्धांत के लेख वह नहीं उठा पायें हैं और न ही यह विषय उनके खुद के खोज का है अतः वह समग्र और तकनिकी जानकारी नहीं दे पायें हैं |किसी का पोस्ट उठाकर पढ़ते हुए विडिओ बना देना आसान है किन्तु तकनीक जानना और वास्तविक भला करना तो केवल खुद के ज्ञान से ही सम्भव है |हमारे इसी लेख को की कुलदेवता या देवी का पता कैसे लगाएं ,लोगों ने कापी भी किया होगा और हो सकता है विडिओ भी बनाए हों किन्तु जो गंभीर इससे जुडी बातें हम बताने जा रहे हैं वह कोई नहीं बता सकता |इस विषय पर एक लेख तो हम भी पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं किन्तु आज वह बात कहने जा रहे जो आपका वास्तविक भला करेगा और इसे न कोई कापी करने वाला बता सकता है न कोई तांत्रिक ,ज्योतिषी ,पंडित या ओझा -गुनिया |
कुलदेवता या देवी को जानना मुश्किल नहीं ,यह तो आसान है इस छोटी सी विधि से भी ,पर असली समस्या उसके बाद ही है क्योंकि आप अपने कुलदेवी या देवता को जानकर भी उन्हें खुश नहीं कर सकते ,उन्हें नियमतः पूजा नहीं दे सकते जब तक की आपको यह जानकारी न हो जो कुलदेवता का पता लगाने की विधि के बाद बताई जायेगी |इसलिए यदि आप अपना वास्तविक भला चाहते हैं और सचमुच कुलदेवी /देवता की स्थापना पूजा करना चाहते हैं तो ध्यान से पढ़ें |
आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों से कुलदेवता/देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घर-परिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता/देवी कौन है |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |
 प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें और ११ मंगलवार तक करते रहें |मंगलवार को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता/देवी मानकर स्नान आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी भाषा में उनसे अनुरोध करें की "हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता/देवी में आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस-मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको स्वप्न में आपके कुलदेवता/देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी |
यह तो हुई कुलदेवता या देवी का पता लगाने की विधि किन्तु आप पता लगाकर क्या करेंगे और आज के अनुसार पूजा करके भी क्या करेंगे जब तक की आपको अपने वंश -परंपरा के अनुसार होने वाली पूजा पद्धति का पता न हों |उस तिथि का पता न हो जिस तिथि पर आपके पूर्वज पूजा करते आये थे |आपको कुलदेवता या देवी का नाम पता लग जाए तो भी आपका वास्तविक भला नहीं हो सकता जब तक की आपको अपने कुल परंपरा के अनुसार पूजा पद्धति न पता हो | कुलदेवता /देवी के बारे में नाम आदि कुछ सिद्ध बता सकते हैं किन्तु आपकी कुलानुसार पूजा पद्धति कोई नहीं बता सकता |
ध्यान दीजिये आप सभी किसी न किसी ऋषि के ही वंशज हैं और आपके पूर्वज ऋषि ने अपने अनुकूल ,अपने कर्म के अनुकूल ,अपने संस्कारों के अनुकूल कुल देवता या कुलदेवी की स्थापना की थी और अपनी संस्कृति और संस्कार के अनुसार पूजा पद्धति बनाई थी जिससे उस कुलदेवता या देवी की कृपा उन्ह प्राप्त होती रहे |उदाहरण के लिए हम गौतम ऋषि के वंशजों को लेते हैं |गौतम ऋषि जहाँ रहते थे वहां स्थानिक रूप से उपलब्ध सामग्रियों में से उन्होंने अपने कुलदेवता के अनुकूल वस्तुओं का चयन कर एक पूजा पद्धति बनाई और पूजा शुरू की |फिर अपने से सम्बन्धित सम्बन्धियों के कर्मानुसार चारो कर्म के अनुकूल विशेष पूजा पद्धतियाँ बना दी जो उस कुलदेवता या देवी की चार विशिष्ट प्रकार की पूजा हो गयी |यह चार प्रकार के कर्म करने वाले ही बाद में जातियों में बदल गए ,किन्तु उनके पूजा पद्धति इन्ही चार प्रकारों में से रहे |ध्यान दीजिये गौतम ऋषि सहित सभी ऋषियों के गोत्र अन्य जातियों में भी मिलते हैं |ऊँची ,नीची जाती का कोई विशेष अलग गोत्र नहीं होता और सभी ऋषियों की ही संतानें हैं |तो अब उस स्थान विशेष पर कर्मानुसार एक देवता की चार प्रकार की पूजा हो गयी |कालान्तर में उस स्थान से कुछ लोग निकलकर देश -विदेश के अलग स्थानों पर बसे किन्तु उनकी पूजा पद्धति एक ही रही | मूल स्थान से दूरी अधिक होने पर और मूल पूजन सामग्री की उपलब्धता न होने पर उन्होंने अपने गुरुओं ,श्रेष्ठों से सलाह -मशवरा करके विकल्प के साथ स्थायी पूजा पद्धति उस स्थान पर बना ली |अब उस कुल -गोत्र की वह पूजा पद्धति स्थायी हो गयी और वह कुलदेवता /देवी के अनुकूल थी |ऐसा ही सभी ऋषियों के वंशजों और कर्म विशेष वाली जातियों के साथ हुआ |अब किसी दूर देश में अलग अलग ऋषियों के वंशजों की पूजा पद्धतियों में तो भिन्नता हुई ही उनके कुलदेवता या देवी भी अलग अलग हो गए ,इसके बाद इनमे से उत्पन्न जातियों के पूजा पद्धति और अलग हो गए जो अपने मूल ऋषि की पूजा पद्धति से तो मिलते जुलते थे किन्तु जाति अनुसार आपस में भी और भिन्न ऋषियों के वंशजों से भी बिलकुल भिन्न हो गए |इस प्रकार हर कुल -वंश के लिए अलग पूजा पद्धति विकसित हो गयी |विशेष पूजा पद्धति के अनुसार कई हजार वर्ष पूजा होते रहने से उनके कुलदेवता और देवी उस पूजा पद्धति के अनुकूल रहे |इस पूजा पद्धति में बाद में बदलाव नहीं किया जा सकता क्योंकि ऊर्जा प्रकृति बिगड़ने की सम्भावना रहती है |क्या पता किसी कुलदेवता कोई कोई चीज नापसंद हो |
         यह भी ध्यान दीजिये कि उस समय सभी वस्तुएं सभी जगहों पर न पैदा होती थी न ही उपलब्ध होती थी अतः स्थान विशेष की पूजा पद्धति विशेष होती थी |आज वह स्थिति नहीं है ,हर वस्तु हर स्थान पर उपलब्ध हो जा रही है और यह भी आप नहीं कह सकते की कोई वस्तु नहीं मिल रही |आपके कुलदेवता सब देख रहे हैं की आप कितने गंभीर हैं और बहाना तो नहीं बना रहे |आप सोचिये स्थान स्थान पर अलग अलग ऋषि वंशजों और जातियों की जब अलग अलग पूजा पद्धति हो गयी तो एक ही पूजा पद्धति किसी कुलदेवता या देवी के लिए कैसे अनुकूल होगी |कोई ज्ञानी ,जानकार ,पंडित आपके कुलदेवता या देवी के बारे में तो बता देगा या आप उपर बताई हमारी ही पद्धति से उनके बारे में जान तो जायेंगे पर आप पूजा पद्धति कहाँ से लायेंगे ,यह कौन बतायेगा ,क्या क्या उस देवता के अनुकूल है आपके वंश परंपरा के अनुसार आप कैसे जानेंगे ,क्या क्या चढ़ाया जाएगा या चढ़ाया जाता रहा है यह आप कैसे जानेंगे ,कौन सी तिथि उनकी पूजा के लिए उपयुक्त रही है और आपके पूर्वज किस तिथि को उन्हें पूजते रहे हैं आप कैसे जानेंगे |यह सब कोई सिद्ध ,तांत्रिक ,पंडित ,पुरोहित ,ज्योतिषी नहीं बता सकता |न ही कोई विधि इसके बारे में बता सकती है |कोई जानकार हर कुल -वंश और उनकी परंपरा के बारे नहीं बता सकता अतः मूल पद्धति का ,वस्तुओं का पता लगाना कुलदेवता /देवी को जानने से अधिक जरुरी है क्योंकि एक ही देवता की वंश -कुल के अनुसार कई तरह की पूजा पद्धतियाँ हो सकती हैं |
यह कुलदेवता हजारों वर्षों तक विशेष प्रकार की पूजा पाते पाते उसके आदी हो चुके होते हैं और यह उनके अनुकूल भी होता है अतः इसमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता |छोटा सा परिवरतन इन्हें रुष्ट कर देता है |उस समय के ऋषि ज्ञानी थे जो कहीं कहीं उन्होंने विकल्प खोज कर स्थान विशेष की पद्धति बना ली किन्तु आज उस स्तर का कोई ज्ञानी नहीं मिलता अतः परिवर्तन नहीं किया जा सकता |मूल पूजा पद्धति का कोई विकल्प नहीं |हमने खुद इतने वर्षों की खोज के बाद एक पूजा पद्धति विकसित की है किन्तु उसे हमने नवरात्र से जोड़ा है क्योंकि हम जानते हैं की मूल पद्धति का कोई विकल्प नहीं |जो भी विकल्प बनाए जायेंगे वह उतना लाभ नहीं दे पायेंगे |हमारे बनाए पूजा पद्धति को भी कुछ महागुरु लोग हमारे ब्लॉग से और फेसबुक पेज से कापी करके फेसबुक या यू ट्यूब पर डाल चुके हैं किन्तु यह लोग हमारे ज्ञान और विशेष तकनीकी पद्धति को कहाँ से लायेंगे जो हम अपने विडिओ में प्रकाशित करेंगे या लिखेंगे |कुलदेवता या देवी की पूजा पद्धति हम पहले ही इस ब्लॉग पर और फेसबुक पेजों पर प्रकाशित कर चुके हैं किन्तु फिर से नए लेख में विस्तार से वह तकनीकियाँ हम शामिल कर रहे जिससे लोगों को अधिकतम लाभ मिल सके |धन्यवाद ............................................................................हर-हर महादेव

शनिवार, 1 जून 2019

सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो सकता है ?


सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ?
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 हनुमान जी और उनके सुन्दरकाण्ड ,हनुमान चालीसा ,बाहुक ,अष्टक आदि का पाठ बहुधा हिन्दू घरों में होता है या अक्सर सूना जाता है |हनुमान जी कलयुग में सर्वाधिक जाग्रत देवता माने जाते हैं और यह अमर और चिरंजीवी हैं |इनकी आराधना यदि नियमानुसार और श्रद्धा भक्ति से की जाय तो निश्चित लाभ होता ही होता है |कुछ सावधानियां और विशेष जानकारियाँ हम अपने श्रोताओं /पाठकों को इस सम्बन्ध में देने जा रहे हैं कि कैसे हनुमान जी की आराधना और सुन्दरकाण्ड का पाठ आपके लिए अधिकतम लाभप्रद हो सकता है |ऐसा क्या क्या करना चाहिए की सुन्दरकाण्ड से आपके सभी समस्याओं का निराकरण हो जाय और आपको खुशहाली प्राप्त हो ,आपका पाठ असफल न हो |
हनुमान आराधना में सुन्दर काण्ड के पाठ को सदैव से विशेष स्थान दिया जाता है क्योकि इस खंड में हनुमान की अतुलनीय बुद्धि ,बल ,विवेक दिखाई देती है |रामचरित मानस भगवान् राम के जीवन पर आधारित है और इसमें सुन्दर काण्ड खंड भगवान हनुमान से विशेष रूप से जुडा है |सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमान आराधना का विशेष और अद्वितीय लाभ होता है |इसके पाठ से हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और हनुमान जी पाठकर्ता की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं |सुन्दरकाण्ड का नित्यप्रति पाठ करना हर प्रकार से लाभ दायक होता है, इसके अनंत लाभ है, इस पाठ को हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक लगा कर करने से अधिक फल प्राप्त होता है, सुन्दरकाण्ड एक ऐसा पाठ है जो की हर प्रकार की बाधा और परेशानियों को खतम कर देने में पूर्णतः समर्थ है |आप इसे रोज नहीं कर सकते हैं तो आप मंगलवार -मंगलवार इसे कर सकते हैं | इस बात का विशेष ध्यान रखना बहुत जरुरी है के आपका पाठ जब तक चले तो मांस मदिरा का सेवन करे ही अपने घर में मांस मदिरा लाये जब तक पाठ हो आपको ब्रह्मचर्य और सदाचार का पालन करना चाहिए ,क्योकि हनुमान जी परम सात्विक देवता हैं |
ज्योतिष के अनुसार भी सुन्दरकाण्ड एक अचूक उपाय है ज्योतिषो के द्वारा उपाय के तौर पर अक्सर बताया जाता है, उन लोगो के लिए ये विशेष फलदाई होता है जिनकी जन्म कुंडली में - मंगल नीच का है, पाप ग्रहों से पीड़ित है, पाप ग्रहों से युक्त है या उनकी दृष्टि से दूषित हो रहा है, मंगल में अगर बल बहुत कम हो, अगर जातक के शरीर में रक्त विकार हो, अगर आत्मविश्वास की बहुत कमी हो, अगर मंगल बहुत ही क्रूर हो तो भी ये पाठ आपको निश्चित राहत देगा|. अगर लगन में राहू स्थित हो, लगन पर राहू या केतु की दृष्टि हो, लगन शनि या मंगल के दुष्प्रभावो से पीड़ित हो, मंगल अगर वक्री हो या गोचर में मंगल के भ्रमण से अगर कोई कष्ट रहे हो, शनि की सादे साती या ढैय्या से आप परेशान हो, इत्यादि..... इन सभी योगो में सुन्दरकाण्ड का पाठ अचूक फल दायक माना जाता है,,इसके अतिरिक्त सुन्दरकाण्ड के पाठ से घर में सकारात्मक ऊर्जा का आगमन और नकारात्मक ऊर्जा का क्षरण होता है ,जिससे बहुविध खुशहाली आती है |
सुन्दरकाण्ड के पाठ से लाभ
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[] सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलता है, ये आत्मविश्वास में बढोतरी करता है और परीक्षा में अच्छे अंक लाने में मददगार होता है, बुद्धि कुशाग्र होती है,|
[] इसका पाठ मन को शांति और सुकून देता है मानसिक परेशानियों और व्याधियो से ये छुटकारा दिलवाने में कारगर है|,
[] जिन लोगो को गृह कलेश की समस्या है इस पाठ से उनको विशेष फल मिलते है,|
[] अगर घर का मुखिया इसका पाठ घर में रोज करता है तो घर का वातावरण अच्छा रहता है,|
[] घर में या अपने आप में कोई भी नकारात्मक शक्ति को दूर करने का ये अचूक उपाय है,|
[] अगर आप सुनसान जगह पर रहते है और किसी अनहोनी का डर लगा रहता हो तो उस स्थान या घर पर इसका रोज पाठ करने से हर प्रकार की बाधा से मुक्ति मिलती है और आत्मबल बढ़ता है. |
[] जिनको बुरे सपने आते हो रात को अनावश्यक डर लगता हो इसके पाठ निश्चित से आराम मिलेगा.|
[] जो लोग क़र्ज़ से परेशान है उनको ये पाठ शांति भी देता है और क़र्ज़ मुक्ति में सहायक भी होता है,|
[] जिस घर में बच्चे माँ पिता जी के संस्कार को भूल चुके हो, गलत संगत में लग गए हो और माँ पिता जी का अनादर करते हो वहा भी ये पाठ निश्चित लाभकारी होता है.|
[१०] किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक रोग भले क्यों हो इसका पाठ लाभकारी होता है.|
[११] भूत प्रेत की व्याधि भी इस पाठ को करने से स्वतः ही दूर हो जाती है.|
[१२] नौकरी में प्रमोशन में भी ये पाठ विशेष फलदाई होता है|.
[१३] घर का कोई भी सदस्य घर से बाहर हो आपको उसकी कोई जानकारी मिल पा रही हो या भी मिल पा रही हो तो भी आप अगर इसका पाठ करते है तो सम्बंधित व्यक्ति की निश्चित ही रक्षा होगी, और आपको चिंता से भी राहत मिलेगी. |
 इसके अलावा ऐसे बहुत से लाभ है जो सुन्दरकाण्ड से मिलते है आप सभी इस पाठ का लाभ उठा सकते हैं  और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस कर सकते हैं , जीवन सार्थक बना सकते हैं |आपको यदि कभी सुन्दरकाण्ड से कम लाभ मिलता है या कभी कभी लाभ नहीं मिलता तो इसमें आप द्वारा कोई त्रुटी की भूमिका हो सकती है या सावधानियों में कमी हो सकती है या नियमों की अनदेखी हो सकती है |ध्यान दीजिये हनुमान जी एक अति सौम्य ,सकारात्मक और उग्र ,पराक्रमी शक्ति हैं अतः इनकी उपासना में नियम और सावधानियां अवश्य होनी चाहिए }हनुमान उपासना सम्बन्धी नियम और सावधानियां हम अपने इस ब्लॉग पर पहले ही प्रसारित कर चुके हैं ,फिर भी कुछ सावधानिय और नियम हम बता रहे हैं और आपको सुन्दर काण्ड से सर्वमनोकामना पूर्ती का प्रयोग भी बता रहे हैं |
यद्यपि सुन्दरकाण्ड पाठ से सुख -समृद्धि -शान्ति प्राप्त होती है और नकारात्मक प्रभावों ,संकटों का नाश होता है ,सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं किन्तु किसी एक समस्या या विषय पर पूर्ण और निश्चित सफलता हेतु कुछ विशेष नियम और प्रयोग हैं जिनसे किसी समस्या का निश्चित निराकरण किया जा सकता है |सुन्दरकाण्ड से सभी कामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं किन्तु विशेष उद्देश्य के लिए हनुमान जी को लक्ष्य दिखाना पड़ता है |ध्यान दीजिये जब तुलसीदास जी को बाहु पीड़ा ने परेशान किया तो उन्होंने हनुमान आराधना के लिए हनुमान बाहुक की रचना की जबकि वह स्वयं सुन्दरकाण्ड आदि के रचयिता थे |इसी प्रकार सुन्दरकाण्ड से विषय विशेष की कामना हेतु हनुमान जी को विषय या समस्या याद दिलाने के लिए सुन्दरकाण्ड के पाठ को विशेष मंत्र श्लोक से संपुटित करने पर हनुमान जी की ऊर्जा लक्ष्य पर केन्द्रित होती है |सुन्दरकाण्ड का पाठ हनुमान जी का गुणगान है जिसमे सम्पुटित श्लोक या मंत्र का प्रयोग उन्हें विशेष दिशा देता है |जैसे दोहा ,चौपाई और श्लोक के बीच यदि इस श्लोक [मंत्र ] -
का प्रयोग किया जाय -
 सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धनधान्य सुतान्वितः ,एकमेव त्वयाकार्यम अस्मद्वैरी विनाशनम
या -
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। 
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥” 
 इससे हनुमान जी की उर्जा शत्रु विनाश के लिए विशेष कार्य करेगी यद्यपि अन्य लाभ भी अपने आप होंगे |इस तरह के कार्य विशेष के लिए उपयुक्त श्लोक या मंत्र हर चौपाई ,दोहे और अन्य श्लोकों के बीच लगाकर सुन्दरकाण्ड को संपुटित किया जाता है और वह कार्य विशेष की सफलता निश्चित हो जाती है |अब सबसे महत्वपूर्ण जानकारी हम आपको देना चाहेंगे जिसके बारे में शायद आपने सोचा तक न हो |आप अपने पाठ के पूर्व संकल्प जरुर से लें कि आप अमुक कार्य विशेष की सिद्धि के लिए सुन्दरकाण्ड का पाठ करने जा रहे हैं हनुमान जी आपकी मनोकामना पूर्ण करें |बिना संकल्प लिए किया हुआ पाठ निष्काम संकल्प के अंतर्गत अथवा मात्र सामान्य स्मरण के अंतर्गत आ जाता है जिससे उद्देश्य विशेष की ओर ऊर्जा न लगकर पूर्ण लाभ नहीं देती अतः हाथ में जल अक्षत पुष्प लेकर संकल्प करके पाठ करें |
अब इससे भी महत्वपूर्ण बात |आप किसी अन्य से पाठ कराने की बजाय या किसी अन्य का पाठ सुनने की बजाय खुद पाठ करें |किसी अन्य का पाठ सुनने से आपमें भक्ति भले जगे पर इससे बहुत अधिक लाभ नहीं होना |इसका लाभ तभी है जब आप खुद पाठ करने में सक्षम न हों तो किसी अन्य का पाठ सुनने से आपको कुछ लाभ हो जाएगा |हम आपको बताना चाहेंगे की आप द्वारा बोला गया हर शब्द अमर हो जाता है और करोड़ों वर्ष बाद भी उसे सुना जा सकता है |आज के ही विज्ञान ने इसे प्रमाणित कर दिया है और ऐसे यन्त्र तक बन गए हैं जिनसे लाखों वर्ष पूर्व बोले गए महापुरुषों आदि के वाक्य पकडे और यथावत सुने जा रहे हैं |तो आप द्वारा बोला गया हर शब्द ब्रह्माण्ड में प्रसारित हो जाता है और यह जब उस सम्बन्धित शक्ति या ऊर्जा के सम्पर्क में आता है तो वह ऊर्जा बोलने वाले की ओर आकर्षित होती है |इसीप्रकार जब आप खुद पाठ करते हैं तो हनुमान की ऊर्जा आपकी ओर खिचती है और आपसे जुडकर लाभ देती है ,बस पाठ बीच में छोड़ें नहीं और लगातार कुछ बार निश्चित दिन और समय तक करते रहें |एक बात और जब आप खुद पाठ करते हैं तभी हनुमान की ऊर्जा आपके शरीर के सम्बन्धित चक्र से जुडती है और आपको स्थायी लाभ होता है ,किसी अन्य का पाठ सुनने से ऐसा नहीं होता क्योंकि पाठ करने पर होने वाला ध्वनी कम्पन जब आपका होगा तभी आपके चक्र आंदोलित हो शशक्त होंगे |अतः खुद पाठ करें |कुछ बातें और ध्यान दें ,आप हनुमान की उपासना या सुन्दरकाण्ड का पाठ जिस दिन करें उस दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें ,मांस -मदिरा -अंडा ,तामसिक भोजन ,गाली -गलौज ,दुष्ट संगत से दूर रहें तथा सिन्दूर का तिलक जरुर करें |आप मन में अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहें और पूर्ण श्रद्धा हनुमान जी के प्रति रखते हुए पूरा विश्वास रखें की आपका कार्य अवश्य होगा और आप पर हनुमान जी की कृपा अवश्य होगी |आपकी सफलता बढ़ जायेगी |............................................................हर-हर महादेव

महाशंख  क्या होता है ?

                      महाशंख के विषय में समस्त प्रभावशाली तथ्य केवल कुछ शाक्त ही जानते हैं |इसके अलावा सभी लोग tantra में शंख का प्रयोग इसी...